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स्वभाषा के बिना महाशक्ति कैसे बनेगा देश ?

bhasa People generally do not know why the United Nations celebrates World-Mother Tongue Day on 21 February. In almost all the nations
Vedpratap Vaidik

वेदप्रताप वैदिक

आम तौर पर लोगों को पता नहीं होता कि संयुक्त राष्ट्र 21 फरवरी को विश्व-मातृभाषा दिवस क्यों मनाता है। दुनिया के लगभग सभी राष्ट्रों में इस दिन मातृभाषाओं के सम्मान से जुड़े आयोजन होते हैं, लेकिन इसका श्रेय हमारे पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश को जाता है। बांग्लादेश 1971 के पहले तक पाकिस्तान का हिस्सा था। इसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। इस पूर्वी पाकिस्तान की जनता बांग्लाभाषी है लेकिन इस पर उर्दू थोप दी गई थी। पश्चिम पाकिस्तान के लोगों की भाषाएं हैं- पंजाबी, सिंधी, बलूच और पश्तो लेकिन उन्होंने भारत से गए मुहाजिरों की भाषा उर्दू को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया था। 1948 में जब पाकिस्तान की संविधान सभा में उर्दू को राजभाषा घोषित किया गया तो बांग्ला सदस्यों ने उसका कड़ा विरोध किया लेकिन उनकी दलीलें रद्द कर दी गईं।

मातृभाषा आंदोलन
नतीजा यह हुआ कि पूरे पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन की आग भड़क उठी। ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने जबर्दस्त प्रदर्शन किए। ऐसे ही एक प्रदर्शन पर पाकिस्तानी फौज ने गोलियां बरसाईं। 21 फरवरी 1952 को पांच नौजवान शहीद हो गए। तभी से 21 फरवरी का दिन मातृभाषा-दिवस के तौर पर बांग्लादेश में मनाया जाने लगा। इसी मातृभाषा आंदोलन से आगे चलकर बांग्लादेश का जन्म हुआ। बांग्लादेश के निर्माण (1971) के बाद यह मांग निरंतर उठती रही कि मातृभाषा-दिवस को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलवाई जाए। शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश सरकार ने यूनेस्को की महासभा से 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस घोषित करवा लिया। सन 2000 से यह सारी दुनिया में मनाया जाता है। दुनिया में इस समय 7000 मातृभाषाएं या स्वभाषाएं या बोलियां हैं। इनमें कइयों की कोई लिपि नहीं है, व्याकरण नहीं है, पुस्तकें नहीं हैं, अखबार नहीं हैं लेकिन फिर भी वे जीवित हैं और प्रचलित हैं।

उनमें से लगभग आधी ऐसी हैं, जिनकी रक्षा नहीं हुई तो वे काल-कवलित हो जाएंगी। दुनिया के दूसरे देशों की बात अभी जाने दें, हमारे दक्षिण एशिया में मातृभाषाओं का आज क्या हाल है? यदि हम अफगानिस्तान, नेपाल और भूटान को छोड़ दें तो बताइए कौन सा ऐसा देश हमारे पड़ोस में है, जहां उसकी स्वभाषा या मातृभाषा या राष्ट्रभाषा को उसका समुचित स्थान मिला हुआ है। दक्षिण एशिया के इन देशों को आजाद हुए अब 75 साल पूरे होने को हैं लेकिन जहां तक मातृभाषा का सवाल है, इस मामले में वे अब भी घुटनों के बल रेंग रहे हैं। मैंने अफगानिस्तान, नेपाल और भूटान की संसदों और राज-दरबारों में उनकी अपनी भाषाओं का प्रयोग होते हुए देखा है। उनके कानून, न्याय, शिक्षण, राज-काज और घर-बाजार की भाषा उनकी अपनी है। इन तीनों देशों को अपनी भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धति पर गर्व है।

गर्व तो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव को भी है। वे अपनी भाषा को महारानी कहते हैं लेकिन उसका दर्जा सर्वत्र नौकरानी का है। इन राष्ट्रों की अपनी भाषाओं में न तो इनका कानून बनता है और न ही उनके जरिए अदालतों में बहस होती है। जो फैसले होते हैं, वे भी अंग्रेजी में होते हैं। इन देशों की संसदों में ज्यादातर बहस भी अंग्रेजी में ही होती है। मातृभाषा तभी सुनने में आती है, जब नेताजी को अंग्रेजी नहीं आती हो। इन देशों में भी भारत की तरह पब्लिक स्कूलों की बहार आई हुई है। संपन्न और शहरी मध्यम वर्ग के बच्चे इन्हीं स्कूलों में लदे रहते हैं और वे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़े बच्चे सरकारी नौकरियां हथिया लेते हैं। यदि मातृभाषाओं और राष्ट्रभाषा को उनका उचित स्थान मिल जाए तो हमारे अस्पताल और न्यायालय जादू-टोनाघर बनने से बच सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को जब मातृभाषाओं की बात करते हैं तो उनका आशय यह नहीं होता है कि बच्चे दूसरी भाषाओं का बहिष्कार कर दें। वे अपनी मातृभाषा जरूर सीखें लेकिन उसके साथ-साथ राष्ट्रभाषा भी सीखें। जिन राष्ट्रों में कई भाषाएं हैं, वहां राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता और समग्र विकास का पर्याय होती है। जहां तक विदेशी भाषाओं का सवाल है, उन्हें भी जरूरत के मुताबिक सीखा जाए तो बहुत अच्छा है। विदेशी भाषाओं का ज्ञान विदेश-व्यापार, राजनय और शोध-कार्य के लिए आवश्यक है। लेकिन इन तीनों कामों में कितने लोग लगे हैं ? मुश्किल से एक लाख लोग। लेकिन हमारे देश में तो 140 करोड़ लोगों पर एक विदेशी भाषा थोप दी गई है। अनिवार्य अंग्रेजी के चलते करोड़ों बच्चे हर साल अनुत्तीर्ण होते हैं। उनका मनोबल गिरता है और उनकी हीनता-ग्रंथि मोटी होती चली जाती है। सर्वोच्च पदों तक पहुंचने के बाद भी वह ज्यों की त्यों बनी रहती है।

हमारे पुराने मालिकों की भाषा अंग्रेजी सिर्फ साढ़े चार देशों की भाषा है। ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की। यह कनाडा की भी भाषा है लेकिन आधा कनाडा फ्रांसीसी बोलता है। चीन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली आदि देशों का सारा महत्वपूर्ण काम उनकी अपनी भाषा में होता है। विदेशी भाषा के जरिए कोई भी देश आज तक महाशक्ति नहीं बना है। इन सब देशों में रहकर मैंने उनके विश्वविद्यालय, संसदें, अदालतें, सरकारी दफ्तर, घर और बाजार देखे हैं। सर्वत्र उनकी अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा का बोलबाला है। हमारे देश में अंग्रेजी अकेली ऐसी विदेशी भाषा है, जिसका सर्वत्र बोलबाला है। इसका उपयोग चीन, जापान, रूस, फ्रांस और जर्मनी के साथ करके क्या हम अपने व्यापार, कूटनीति और शोध-कार्यों में उनका समुचित लाभ उठा सकते हैं?

मौलिकता को नुकसान
एकमात्र विदेशी भाषा (अंग्रेजी) की अनिवार्यता ने भारत को नकलची बना दिया है। उसकी मौलिकता को पंगु कर दिया है। भारत के मुट्ठी भर लोगों की उन्नति में अंग्रेजी का योगदान जरूर है लेकिन भारत के 100 करोड़ से भी ज्यादा गरीबों, पिछड़ों, ग्रामीणों, मजदूरों और वंचितों का उद्धार उनकी स्वभाषाओं के बिना नहीं हो सकता। आज तक स्वतंत्र भारत में एक भी सरकार ऐसी नहीं आई है, जो राष्ट्रीय विकास में भाषा की भूमिका को ठीक से समझती हो। कुछ सरकारों ने जब-तब थोड़े-बहुत कदम जरूर उठाए हैं लेकिन जब तक मातृभाषाओं और राष्ट्रभाषा का हर क्षेत्र में सर्वोच्च स्तर तक प्रयोग नहीं होगा, भारत महासंपन्न और महाशक्ति नहीं बन पाएगा।

 

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