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उत्तराखंड के कण-कण में विराजमान हैं भगवान शिव

Devotees celebrate the union of Lord Shiva and Parvati as Maha Shiva Shiva. The Maha Shiva Mahashiva night of Shiva Sadhana will be celebrated across the country on 11 March. Harsal lakhs of devotees visit various temples of Uttarakhand to receive the blessings and blessings of Mahadev, the God of Gods.

समग्र समाचार सेवा
देहरादून 10 मार्च।

भगवान शिव और पार्वती के मिलन के उत्सव को भक्त महाशिव रात्रि के रूप में मनाते हैं। शिव साधना का महापर्व महाशिव रात्रि 11 मार्च को देश भर में मनाया जाएगा। उत्तराखंड के विभिन्न मंदिरों में देवों के देव महादेव की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हरसाल लाखों श्रद्धालु आते हैं।

देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए उत्तराखंड पर्यटन विभाग की ओर से 24 शिव मंदिरों को धार्मिक पर्यटन के रूप में तैयार किया है। देवभूमि के 24 शिव मंदिरों में भगवान शिव साक्षात विराजमान हैं। जहां शिव की भक्ती में तल्लीन होकर उनकी विधि विधान से पूजा अर्चना की जा सकती है।

देवभूमि उत्तराखंड को शिव की भूमि कहा गया है। यहीं कैलास पर शिव का वास है और यहीं कनखल (हरिद्वार) व हिमालय में ससुराल। आद्य शंकराचार्य के उत्तराखंड आने से पूर्व यहां शैव मत का ही बोल बाला रहा है और सभी लोग भगवान शिव के उपासक थे। आज भी शिव विभिन्न रूपों में उत्तराखंड के आराध्य देव हैं।

पर्यटन सचिव श्री दिलीप जावलकर ने कहा कि आस्था के महापर्व शिवरात्रि के दिन उत्तराखंड के मंदिरों में आने वाले शिव भक्तों का हम स्वागत करते हैं। उत्तराखंड के कण-कण में भगवान शिव साक्षात रूप से विराजमान हैं। यहां के मंदिर आस्था ही नहीं आर्थिकी का भी केंद्र हैं। इन मंदिरों से हजारों लोगों की आर्थिकी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जुड़ी हुई है।

उत्तराखण्ड में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए शैव सर्किट में गढ़वाल मण्डल से 12 व कुमाऊँ मण्डल से 12 प्राचीन मंदिरों को समावित किया गया है।

गढ़वाल मण्डल के 12 प्राचीन शिव मंदिर-

1-एकेश्वर महादेव, पौड़ी-यह भगवान शिव को समर्पित विख्यात और महत्वपूर्ण सिद्धपीठों में से एक है। पर्वित्र परिसर के अन्दर वैष्णों देवी और भैरवनाथ जी को समर्पित मंदिर भी शामिल है। एकेश्वर महादेव को स्थानीय भाषा में ‘इगासर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है।

2-केदारनाथ, रूद्रप्रयाग-मन्दाकिनी नदी के किनारे समुद्र तट से लगभग 3584 मी की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर शिव के धाम के नाम से बिख्यात है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से, इस धाम में एक ज्योतिर्लिंग यह है।

3-मदमहेश्वर, ऊखीमठ-चैखम्भा की गोद में समुद्र तल से 9700 फीट की ऊंचाई पर यह मन्दिर अवस्थित है, जो ऊखीमठ से 30 किमी0 की दूरी पर है। पंचकेदार के नाम से विख्यात भगवान शिव के पाँच पावन धाम में से मदमहेश्वर दूसरा पावन धाम है। यहाँ भगवान शिव की नाभि की पूजा की जाती है।

4-तुंगनाथ, चोपता-पंच केदारो में तृतीय केदार तुंगनाथ समुद्र तल से 12070 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। भगवान तुंगनाथ मन्दिर में भगवान शिव की भुजाओं की पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के निकट ही रावण शिला भी स्थित है जिसके विषय में यह मान्यता है कि लंकापति रावण ने इस शिला पर भगवान शिव की तपस्या की थी।

5-रूद्रनाथ, चमोली-चमोली में चतुर्थ केदार के रूप में श्री रूद्रनाथ मंदिर में भगवान शिव के एकानन यानि मुख स्वरूप की पूजा की जाती है। यहां पर भगवान शिव रौद्र रूप में पूजनीय है। मंदिर तीनों ओर कुण्डों से घिरा है। यहां पर सूर्यकुण्ड, चन्द्रकुण्ड, ताराकुण्ड व मानसकुण्ड स्थित हैं।

6-कोटेश्वर महादेव, टिहरी-विकासखण्ड नरेन्द्रनगर के चाका में भागीरथी नदी के तट पर अवस्थित है। मंदिर में स्वयं भू शिवलिंग है। संतानहीन दंपत्तियों को भगवान शिव का आशीष मिलता है और उनकी मनोकामनाऐं पूर्ण होती है।

7-काशी विश्वनाथ, उत्तरकाशी-विश्वनाथ मंदिर या काशी विश्वनाथ मंदिर सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन हिंदू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह उत्तरकाशी जिले में भागीरथी नदी के तट पर लगभग 150 वर्ष पूर्व निर्मित हुआ है। ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व के अनुसार यह मंदिर साधना और शान्ति का प्रतीक है।

8-दक्ष प्रजापति, हरिद्वार-हरिद्वार जिले के उपनगर कनखल में स्थित दक्ष मंदिर भगवान शिव के अनुयायियों/शिव भक्तों के लिए एक मुख्य तीर्थस्थल है। कनखल भगवान शिव की सुसराल कहलाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव की पत्नी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने इस स्थान पर यज्ञ किया था।

9-शिव मंदिर टिब्बरसैंण, चमोली-टिब्बरसैंण महादेव की इस आध्यात्मिक गुफा में एक प्राकृतिक शिवलिंग बनता है। यहाँ स्थानीय निवासी भगवान शिव लिंग के दर्शन करने आते हैं और गर्मी के मौसम में भगवान शिव को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बाबा बर्फानी की ये गुफा चमोली के अंतिम गांव नीति से सात सौ मीटर की दूरी पर मौजूद है।

10-बिनसर मंदिर, पौड़ी-बिनसर मंदिर में हर साल ‘वैकुण्ड चतुर्दशी’ और कार्तिक पूर्णिमा पर मेले का आयोजन किया जाता है। इस मंदिर को लेकर यह माना जाता है कि यह मंदिर महाराजा पृथ्वी ने अपने पिता बिन्दु की याद में बनवाया था। इस मंदिर को बिंदेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

11-ताड़केश्वर महादेव (लैंसड़ाउन)-ताड़केश्वर महादेव मंदिर टिहरी के लैंसडाउन क्षेत्र में स्थित पवित्र धार्मिक स्थान है। ताड़केश्वर महादेव मंदिर भगवान् शिवजी को समर्पित है। ताड़केश्वर महादेव मंदिर सिद्धपीठों में से एक है और इसे एक पवित्र स्थल माना जाता है।

12-लाखामण्डल शिव मंदिर, देहरादून-देहरादून से कुछ दूरी पर लाखामंडल नामक स्थान पर लाखामण्डल शिव मंदिर स्थित है। मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में यहां पांडवों को जलाकर मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह बनाया था। अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठर ने शिवलिंग की स्थापना इसी स्थान पर की थी। जो मंदिर में आज भी मौजूद है। मौजूद शिवलिंग को महामुडेश्वर के नाम से जाना जाता है।

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