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एनसीईआरटी द्वारा जारी है इतिहास की पुस्तकों में तथ्यों से खिलवाड़

Again and again, wrong images are being written in the minds of children due to misinterpretation of the words in the history books and it seems as if the government does not care about stopping the poison that is going on in the minds of the children.

सोनाली मिश्र।
बार बार इतिहास की पुस्तकों में शब्दों की गलत व्याख्या के कारण बच्चों के मन में गलत छवियाँ बैठती जा रही हैं और ऐसा लग रहा है जैसे सरकार को अब यह परवाह ही नहीं है कि बच्चों के दिमाग में जो जहर जा रहा है, उसे रोका जाए, या बच्चे भारत के असली इतिहास से परिचित हो सकें। यदि होता तो कम से कम कक्षा छ और सात की इतिहास की पुस्तकों में वह परिवर्तन अवश्य करती। यह पुस्तकें बार बार, बच्चों के दिमाग में यह बातें बहुत कोमलता से भर रही हैं कि भारत का कोई इतिहास नहीं था, हिन्दुस्तान शब्द का अर्थ केवल पंजाब तक ही था।
कक्षा 7 की एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तक में प्रथम अध्याय में ही हिन्दुस्तान शब्द को लेकर व्याख्याएं भ्रमित करने वाली हैं। इसमें कहा गया है कि समय के साथ शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं और जो आज हैं वह आने वाले कल में नहीं रहते। यह बात कुछ सीमा तक ठीक भी है। परन्तु जो उन्होंने उदाहरण लिया है, वह थोड़ा सा भ्रामक है। उन्होंने हिन्दुस्तान शब्द का उदाहरण दिया है। इसमें लिखा गया है कि “आज हम हिन्दुस्तान शब्द को सम्पूर्ण भारत के सन्दर्भ में लेते हैं, पर तेरहवीं शताब्दी में जब फारसी के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने हिन्दुस्तान शब्द का प्रयोग किया था तो उसका आशय, पंजाब, हरियाणा और गंगा जमुना के बीच स्थित इलाकों से था। उसने इस शब्द के राजनीतिक अर्थ में उन इलाकों के लिए इस्तेमाल किया, जो दिल्ली के सुलतान के अधिकार क्षेत्र में आते थे। सल्तनत के प्रसार के साथ साथ इस शब्द के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र भी बढ़ते गए, पर दक्षिण भारत को हिंदुस्तान शब्द में नहीं सम्मिलित किया गया था।”
यह अत्यंत भ्रामक वक्तव्य है। दक्षिण भारत तो सदा से ही भारत का अभिन्न अंग था। दक्षिण भारत कैसे भारत का अंग नहीं था उस समय, यह नहीं बता पाते हैं। सबसे पहले तो हिन्दुस्तान शब्द की उत्पत्ति को ही लेकर इनकी अवधारणा की प्रमाणिकता संदेह के घेरे में है। इसका अर्थ यह आता है कि आज जो भारत का राजनीतिक आकार है, वह आकर दिल्ली सल्तनत ने प्रदान किया, जो सरासर झूठ है। क्योंकि भारत की स्पष्ट परिकल्पना इस श्लोक में प्राप्त होती है:
हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरेावरम् |
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्षते ||
यह श्लोक बृहस्पति आगम का बताया जाता है। अर्थात हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक हिन्दुस्थान है। रामायण काल में दक्षिण भारत का उल्लेख है, महाभारत कालीन मानचित्र में पूरा भारत है, फिर हिन्दुस्तान शब्द कैसे मात्र भारत के उत्तरी हिस्से तक सीमित है।
इसके बाद एक और विवरण इसी अध्याय में है कि इन हज़ार वर्षों के दौरान इस उपमहाद्वीप के समाजों में प्राय: परिवर्तन आते रहे और कई क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था तो इतनी सुदृढ़ हो गयी थी कि यूरोप की व्यापारिक कंपनियों को आकर्षित करना शुरू कर दिया था। यहाँ भी यह पुन: भ्रामक तथ्य है। क्योंकि भारत का विदेशों से व्यापार तो न जाने कब से चला आ रहा है, मेगास्थनीज़ ने इसका विवरण अपनी पुस्तक इंडिका में किया है। यूनान, पर्शिया आदि देशों के व्यापारियों का वर्णन मेगस्थनीज ने किया है।
INTERCOURSE BETWEEN INDIA AND THE WESTERN WORLD – ‘इंटरकोर्स बिटवीन इंडिया एंड द वेस्टर्न वर्ल्ड’ में एच जी रालिंसन मेगस्थनीज़ की इंडिका के हवाले से काफी कुछ लिखते हैं, जिनमें व्यापार से लेकर भारत की (हिन्दुओं की) सामाजिक व्यवस्था शामिल है। इतना ही नहीं कक्षा 6 की पुस्तक में जिसमें मध्यकाल से पूर्व के इतिहास का वर्णन है, उसमें सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में इंडिका का उल्लेख न होने के साथ साथ चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था आदि किसी का भी उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। अशोक का उल्लेख अवश्य है क्योंकि कई इतिहासकार हिन्दू धर्म से इतनी घृणा करते हैं कि वह बौद्ध धर्म से ही भारत का इतिहास आरम्भ करते हैं और विशेषकर अशोक से।
कक्षा छ की इतिहास की पुस्तक में अध्याय 4 में ऋग्वेद का उल्लेख करते हुए दास और गुलाम को एक कर के बताया है, कि दास क्या होते थे। जबकि ‘इंटरकोर्स बिटवीन इंडिया एंड द वेस्टर्न वर्ल्ड’ में एच जी रालिंसन मेगस्थनीज़ की इंडिका के हवाले से लिखते हैं कि हिन्दू समाज की एक विशेषता जिसकी सराहना मेगस्थनीज करते हैं, वह यह कि यूनानी और रोमन जगत में वैश्विक प्रथा गुलामी भारत में अज्ञात है। इतना ही नहीं इंडिका का उल्लेख करते हुए वह लिखते हैं कि यद्यपि उच्च वर्ग में बहुपत्नी प्रथा थी, परन्तु स्त्रियों को अत्यधिक स्वतंत्रता थी एवं वह दर्शन का अध्ययन ही नहीं करती थीं, बल्कि वह धार्मिक प्रतिज्ञाएँ भी ले सकती थीं। फिर वह लिखते हैं कि स्त्रियों को परदे में बंद किया जाना मुहम्मद काल से आरम्भ हुआ।
वही मुहम्मद काल जिसे एनसीईआरटी की पुस्तकों में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है जैसे इसी काल ने भारत को आकार दिया। वही मुहम्मद काल जिसके आतताइयों को एनसीईआरटी की पुस्तकों में वास्तु एवं शिल्प का सिरमौर बताया जाता है और साथ ही वही क्रूर मुग़ल जिन्हें एनसीईआरटी की पुस्तकों में दो महान वंशों के वंशज बताया जाता है।
एनसीईआरटी की पुस्तकें और विशेषकर इतिहास की पुस्तकें बच्चों को अपने इतिहास से दूर कर रही हैं परन्तु सबसे दुखद है कि अभी भी सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है!
*साभार –hindupost.in

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