– प्रशांत पोळ
मंदिरों का शहर. एक समूची समृध्द संस्कृति का शहर. कलाओं के वैभव का शहर. इसका आकर्षण अनेक वर्षों से था. छत्रपति शिवाजी महाराज के भोसला वंश ने इस शहर पर अनेकों वर्षों राज किया, इसलिए तो था ही, किन्तु उससे भी ज्यादा, चोल राजाओं की राजधानी और मंदिरों के शहर के रूप में था. अनेक वर्षों के बाद, इस हफ्ते तंजावूर दर्शन का योग आया.
चोल वंश के बिना भारत का इतिहास अपूर्ण हैं. सैकड़ों वर्षों तक इन महापराक्रमी चोल राजाओं ने भारत के बड़े भूभाग पर राज किया. इस दौरान उन्होने भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर अपना शासन – प्रशासन चलाया. हिन्दू धर्म के उन्नयन के लिए जो हो सकता था, वह सब किया. इन सब के साथ अपार संपत्ति, समृध्दी और सुव्यवस्था लायी. सामान्य नागरिक का स्तर ऊंचा किया. चोल राजाओं के शासन काल में हम वैभव के शिखर पर थे. त्रिची के पास चोल वंश के प्रारंभिक काल के राजा करिकलन ने कावेरी नदी पर बांध बांधा. पहली शताब्दी का यह बांध आज भी काम कर रहा हैं. और यह मात्र बांध (dam) नहीं हैं, तो पानी का विभाजन करने की यह रचना हैं. दो हजार वर्ष पहले ऐसा जल व्यवस्थापन कोई कर सकता हैं, यह कल्पना के भी बाहर हैं. (इस बांध के बारे में स्वतंत्र रूप से लिखुंगा).

इस मंदिर के बारे में एक बात, जो सामने नहीं आती, वह इसके निर्माण में निसर्ग से स्थापित किया गया तादात्म्य. आज से हजार वर्ष पहले, राजराजा चोल ने, इस मंदिर को बांधते हुए, ‘वॉटर हार्वेस्टिंग’ को प्रत्यक्ष में उतारा हैं. इस के स्तूपिका में वर्षा का पानी जमने की व्यवस्था हैं. यह पानी नीचे पहुंचाया जाता हैं. नीचे भूमिगत सुरंगों के माध्यम से यह तंजावूर के चार दिशाओं में निर्माण किए गए चार तालाबों में जमा होता हैं. इसके पीछे की कल्पना हैं, की भगवान बृहदेश्वर, अर्थात शंकर जी की जटाओं से निकला पानी, गंगा के रूप में लोगों के काम आए. और वास्तु की रचना तो ऐसी, की इसके गुंबद की परछाई जमीन पर पड़ती ही नहीं. एक मजेदार बात और भी हैं – इसके गोपुरम में जो खंबे हैं, वो दो पत्थरों से बनाएं गए हैं. किन्तु उन्हे किसी आधार की आवश्यकता नहीं हैं. इतना बड़ा भार भी वे सहजता से सहन कर लेते हैं (self-sustained). बाद में अनेक वर्षों के बाद, अंग्रेजों के शासन काल मे, बाहर के द्वार के रखरखाव की योजना बनी. अंदर के जैसा ही बाहर का द्वार बनाने का अंग्रेजों ने प्रयास किया. लेकिन उन्हे, उन खंबों को आधार (support) देना पड़ा (साथ में चित्र दिया हैं). और हम अभी भी कहेंगे, ‘अंग्रेजों की वास्तुकला हमसे बेहतर हैं’..!
मंदिर को राजराजा ने विशेष रुचि ले कर बनाया हैं, तो स्वाभाविकतः नक्काशी से इसे सुंदर बनाने के पूरे प्रयास किए गए हैं. अनेकों मूर्तिया, नाजुक कलाकारी, गज़ब की समरुपता (symmetry)… मंदिर के सामने की नंदी की प्रतिमा भी एक ही पाषाण में बनी हैं, जो ६ मीटर लंबी, २.६ मीटर चौड़ी तथा ३.७ मीटर ऊंची है. स्वतः बृहदेश्वर, अर्थात शंकर भगवान की पिंडी भी विशालतम आकार में हैं.
यह मंदिर देखना अपने आप में एक अनुभव था. हजार वर्ष पहले, कितनी समृध्द और परिपक्व संस्कृति यहां बसती थी, यह सोचकर आश्चर्य होता हैं.
– प्रशांत पोळ