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1950 से अबतर धार्मिक प्रतीकों पर क्या दिए गए फैसले

For the past few days, the matter of ban on hijab in government schools, colleges and other educational institutions in Karnataka is in the

समग्र समाचार सेवा

नई दिल्ली, 10 फरवरी। पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में सरकारी स्कूल, कॉलेजों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब  पर बैन का मामला सुर्खियों में है। राज्यभर में जगह-जगह स्टूडेंट दो समूहों में बंट गए हैं। एक हिजाब के समर्थन में तो दूसरा उसके विरोध में। हिजाब का समर्थन करने वाले और भगवा गमछा या स्कार्फ पहन (उसका विरोध करने वाले स्टूडेंट कई जगह आमने-सामने भी आ चुके हैं। मामला अदालत में है और कर्नाटक हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने इसे बड़ी बेंच में सुनवाई के लिए रेफर कर दिया है। लेकिन ये पहली बार नहीं है जब धार्मिक पहचान, प्रतीकों या धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं। 1950 से लेकर अबतक इसी तरह के कई मामलों में उच्च न्यायपालिका फैसले सुना चुकी है।

कानून के मुताबिक अबतक क्या हुआ

1950 के बाद से सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाई कोर्ट ने नागरिकों को मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 25 में रखी शर्त ‘सब्जेक्ट टु पब्लिक ऑर्डर’ यानी ‘पब्लिक ऑर्डर के अधीन’ शर्त पर जोर दिया है। उच्च अदालतों ने इसी के आधार पर किसी भी मत या संप्रदाय की तरफ से मौलिक अधिकार का दावा करके धार्मिक प्रथाओं और अनुष्ठानों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर बंदिशें लगाई हैं या फिर खारिज किया है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अब एक नजर संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर डालते हैं। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की व्यवस्था है। सबसे पहले बात अनुच्छेद 25 की जो सभी नागरिकों को अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन ये पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है, इस पर शर्तें लागू हैं। आर्टिकल 25 (A) कहता है- राज्य पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता, स्वास्थ्य और राज्य के अन्य हितों के मद्देनजर इस अधिकार पर प्रतिबंध लगा सकता है।

अनुच्छेद 26 में धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता का जिक्र

अनुच्छेद 26 में धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता का जिक्र है। इसके तहत पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में रहते हुए हर धर्म के लोगों को धार्मिक क्रिया-कलापों को करने, धार्मिक संस्थाओं की स्थापना करने, चलाने आदि का इधिकार है। अनुच्छेद 27 में इस बात की व्यवस्था है कि किसी व्यक्ति को कोई ऐसा टैक्स देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिससे किसी खास धर्म का पोषण हो रहा हो। अनुच्छेद 28 के तहत कहा गया है कि पूरी तरह सरकार के पैसों से चलने वाले किसी भी शिक्षा संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। राज्यों द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाओं में लोगों की सहमति से धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है (जैसा मदरसा, संस्कृत विद्यालय आदि) लेकिन ये शिक्षा सरकार की तरफ से निर्देशित पाठ्यक्रम के अनुरूप होने चाहिए।

आनंद मार्गियों को जुलूस और तांडव नृत्य की नहीं दी इजाजत

शैव संप्रदाय से जुड़े आनंद मार्गियों ने भी जुलूस निकालने, नरमुंड (खोपड़ी) के कंकालों और त्रिशूल के साथ तांडव नृत्य के सार्वजनिक प्रदर्शन को आर्टिकल 25 के तहत अपना मौलिक अधिकार बताते हुए दो बार सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। दोनों ही बार सर्वोच्च अदालत ने उनकी मांग ठुकरा दी। एक बार 1984 में और दूसरी बार 2004 में। आनंद मार्ग की स्थापना 1955 में हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तांडव नृत्य मूल रूप से आनंद मार्गियों के लिए अनिवार्य नहीं था। इसे तो आनंद मार्ग के संस्थापक आनंद मूर्ति ने 1966 में धार्मिक अनुष्ठान का जरूरी हिस्सा बनाया।

आनंद मार्ग एक हालिया बना संप्रदाय का दिया गया हवाला

1984 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘आनंद मार्ग एक हालिया बना संप्रदाय है और तांडव नृत्य उसके धार्मिक संस्कारों में और भी बाद में जोड़ा गया। ऐसे में यह संदिग्ध है कि तांडव नृत्य को आनंद मार्गियों के धार्मिक अनुष्ठान का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।’ 2004 में भी सुप्रीम कोर्ट ने आनंद मार्गियों को सार्वजनिक तौर पर तांडव नृत्य की इजाजत से इनकार किया।

गुलाम अब्बास बनाम उत्तर प्रदेश मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

गुलाम अब्बास बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सुन्नी और शिया समुदाय के बीच एक कब्रिस्तान को लेकर चल रहे सदियों पुराने विवाद का निपटारा किया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 और 26 के तहत मिले मौलिक अधिकार असीमित या पूर्ण नहीं हैं। ये पब्लिक ऑर्डर को बरकरार रखने की शर्त के साथ हैं।

कर्नाटक में इन दिनों हिजाब को लेकर घमासान

कर्नाटक में इन दिनों हिजाब को लेकर घमासान मचा है। तो क्या हिजाब पहनना इस्लाम का अभिन्न अंग है? 2006 में मद्रास हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एपी शाह की अगुआई वाली बेंच के सामने भी ये मुद्दा आया था। दरअसल, चुनाव आयोग की तरफ से फोटो वोटर आईडी को अनिवार्य किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका डाली गई थी। एक मुस्लिम व्यक्ति ने याचिका डाली थी। उसने दावा किया कि फोटो वोटर आईडी उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाता है। इसके पीछे दलील दी गई कि वोटर आईडी पर महिलाओं की बिना हिजाब या पर्दा वाली तस्वीर होगी। तस्वीर को अजनबी भी देख सकेंगे। कुरान में इस बात की मनाही है।

वोटर आईडी कार्ड पर तस्वीर को लेकर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘सूडान के एक जाने-माने विद्वान हसन अल तुराबी ने पर्दा से जुड़ीं कुरान की आयतों की व्याख्या की है…कुरान में पैगंबर मोहम्मद की पत्नियों के लिए पर्दा करने का जिक्र है (ताकि पैगंबर मोहम्मद के कमरे की निजता बनी रहे क्योंकि उनके यहां तमाम लोगों का लगातार आना-जाना लगा रहता था)। पैगंबर की पत्नियां ऐसे कपड़े पहनती थीं कि चेहरे और हाथों समेत उनके शरीर का कोई भी हिस्सा किसी पुरुष को नहीं दिखता था। हालांकि, बाकी सभी मुस्लिम महिलाओं को इन बंदिशों से आजादी मिली हुई थी।’

कुरान के चैप्टर 33 की आयत नंबर 55 क्या है

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा ”कनाडाई लेखक सैयद मुमताज अली और राबिया मिल्स ने अपने निबंध में समझाया है, ‘कुरान के चैप्टर 33 की आयात नंबर 53 में हिजाब से जुड़ा आदेश सिर्फ ‘एतमाद करने वालों की माताओं’ यानी ‘पैगंबर की बीवियों’ पर लागू होता है। वहीं कुरान के चैप्टर 33 की आयत नंबर 55 में लिखी बातें सभी मुस्लिम महिलाओं पर लागू होती है। इस आयत में किसी भी तरह के हिजाब (पर्दा) का कोई जिक्र नहीं है। इसमें सिर्फ वक्षस्थल को पर्दे से ढकने और गरिमामयी कपड़ों की बात की गई है। इसलिए भारतीय शैली के पर्दा सिस्टम (पूरे चेहरे को ढंकने वाला नकाब) की प्रथा ठीक नहीं है।”

पर्दा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा?

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, ‘अगर यह मान भी लिया जाए कि पर्दा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है तब भी आर्टिकल 25 ही साफ कर देता है कि ये अधिकार पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता या पब्लिक हेल्थ के अधीन है। इसके अलावा संविधान के भाग-3 के दूसरे प्रावधान भी हैं…हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि चुनाव आयोग का निर्देश (वोटर आईडी पर अनिवार्य तस्वीर) अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं करता है।’

 

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