अरविन्द भारद्वाज। “भाग्य” का दूसरा नाम “करम” भी है । कहते हैं – “हमारे करम में ऐसा ही लिखा था । कहते हैं “करम रेख नहि मिटे, करै कोई लाख चतुराई । इन उक्तियों में “करम” शब्द का भी “भाग्य” के अर्थ में प्रयोग किया गया है । यही उचित भी है । जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही फल मिलता है । मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं ही है । वह जैसे भले-बुरे कर्म करता है, उसी के अनुरूप अपनी उन्नति-अवनति का पथ प्रशस्त करता चलता है । रामायण की वह उक्ति सार्थक ही है – “कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करहि सो तस फल चाखा ।। जैसा बोते हैं वैसा ही तो काटना पड़ता है – “बोवे पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय ।
👉 “करम” में क्या लिखा है, क्या लिखाकर लाए हैं,इस खोजबीन में समय नष्ट करना सर्वथा निरर्थक है । यदि भवितव्यता मिटने वाली ही नहीं है तो भी उसका जानना हानिकारक है और यदि मिट सकती है तो भी उसको जानने की आवश्यकता नहीं है । भविष्य जानने के कारण उत्पन्न हुई मानसिक अस्त-व्यस्तता के कारण साधारण दैनिक कार्यों में भी कठिनाई उत्पन्न होने लगती है । क्षुब्ध व्यक्ति न तो किसी से ठीक तरह व्यवहार कर सकता है और न उसका कोई काम ही ठीक तरह हो पाता है ।
👉 यदि भाग्य किसी जप, पूजन आदि से टल सकता है, तब उसका कोई महत्व ही नहीं रहता । उपाय करने से जो बदल गया वह “भवितव्यता” कैसी ? उसे तो एक खाँसी, जुकाम जैसी छोटी सी संभावना मात्र समझना चाहिए, जो साधारण दवा-दारू से अच्छे होते रहते हैं । थोड़ी सी पूजा-पत्री करा देने से जो शनिश्चर या राहु अपना दुष्परिणाम बंद कर सकता है, जो संभावना किसी के आशीर्वाद और वरादन या अनुष्ठान से टल सकती है उससे डरने की आवश्यकता नहीं । पूजन के अतिरिक्त”सत्प्रयत्न” और “उत्साहपूर्ण परिश्रम” भी वह उपाय हो सकता है जिससे हम अब तक की कठिनाइयों एवं बुरी परिस्थितियों को बदल सकें और भविष्य के लिए अशुभ सम्भवनाओं के स्थान पर आशाजनक परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकें ।

