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🌲सत्संग की अनूठी दुकान और मै !🌲

*कुमार राकेश।
आपको मै एक अपना विशेष अनुभव सुनाता हूँ .आप जानकर खुश ही नहीं बहुत खुश हो जाएँगे .
आयें अब मेरी ख़ुशी के अनुभव से रूबरू करे .साथ में असीम आनंद की अनुभूति करे .
एक दिन मैं सड़क से जा रहा था, रास्ते में एक जगह बोर्ड लगा था, “ईश्वरीय वस्तुओं की दुकान…
ईश्वरीय वस्तु ! ये पढ़कर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई. सोचा,क्यों ना इस दुकान पर जाकर देखूं इसमें बिकता क्या है?
जैसे ही मेरे मन में ये यह ख्याल आया वो दरवाजा अपने आप खुल गया. जी ,आप जरा सी जिज्ञासा रखते हैं तो सम्बंधित द्वार अपने आप खुल जाते हैं, खोलने नहीं पड़ते,मैंने खुद को दुकान के अंदर पाया.ये आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स का सचमुच विशेष नमूना लगा. सोचो और हो गया. काश, आम ज़िंदगी में भी ऐसा होता?

फिर मैंने दुकान के अंदर देखा जगह-जगह कई देवदूत जैसे लोग खड़े थे.एक देवदूत ने मुझे टोकरी देते हुए कहा, आप ध्यान से खरीदारी करना, यहां सब कुछ है जो एक इंसान को चाहिए है…
एक देवदूत ने कहा एक बार में टोकरी भर कर ना ले जा सको, तो दोबारा आ जाना फिर दोबारा टोकरी भर लेना.
मै हतप्रभ था. भाव विभोर! आपाद मस्तक ऊर्जान्वित महसूस करने लगा था.

अब मैंने सभी वस्तुओं को बारी से देखना शुरू किया . आनंद का भाव बढ़ता गया.सबसे पहले “धीरज” खरीदा, फिर “प्रेम”, फिर “समझ”, फिर एक दो डिब्बे “विवेक” के भी ले लिए.

आगे जाकर “विश्वास” के दो तीन डिब्बे उठा लिए, मेरी टोकरी भरती गई.

आगे गया “पवित्रता” मिली सोचा इसको कैसे छोड़ सकता हूं, फिर “शक्ति” का बोर्ड आया शक्ति भी ले ली.
“हिम्मत” भी ले ली सोचा हिम्मत के बिना तो जीवन में काम ही नहीं चलता.
थोड़ा और आगे “सहनशीलता” ली फिर “मुक्ति” का डिब्बा भी ले लिया.
मैंने वह सब चीजें खरीद ली जो मेरे प्रभुजी मालिक को पसंद है,

फिर एक नजर “प्रार्थना” पर पड़ी मैंने उसका भी एक डिब्बा उठा लिया..

वह इसलिए कि सब गुण होते हुए भी अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए तो मैं प्रभु से प्रार्थना कर लूंगा कि वो मेरे को माफ़ कर देंगे!

अति आनंदित होते हुए मैंने उन वस्तुओं को टोकरियों में भर लिया, फिर मैं काउंटर पर गया और सम्बंधित देवदूत से सभी क बिल भुगतान के बारे में पूछा पूछा?* उनका जवाब सुनकर मै चकरा सा गया .

देवदूत बोले -सुनो ,यहां बिल चुकाने का ढंग भी ईश्ववरीय है, अब तुम जहां भी जाना इन चीजों को भरपूर बांटना और लुटाना, जो चीज जितनी ज्यादा तेजी से लूटाओगे, उतना तेजी से उसका बिल चुकता होता जाएगा और इन चीजों का बिल इसी तरह चुकाया किया जाता है…*

कोई- कोई विरला ही इस दुकान पर प्रवेश करता है, जो प्रवेश कर लेता है वह माला-माल हो जाता है, वह इन गुणों को खूब भोगता भी है और लुटाता भी है…

प्रभू की इस दुकान का नाम है “सत्संग की दुकान”

सब गुणों के खजाने हमें ईश्वर से मिले हुए हैं, फिर कभी खाली हो भी जाए तो फिर “सत्संग” में आ कर अपनी टोकरी भर लेना…

फिर मै नतमस्तक होकर उनका धन्यवाद किया और कहा -हे प्रभू ! इस दुकान से एक चीज भी ग्रहण कर सकूं ऐसी कृपा करना.

आप भी आए इस अनूठे दुकान में . सबको ले जाए . आनंद में रहे. आनंदित रहे . जय हो !
वैसे ये मेरा स्वप्न यात्रा का अंश है .इच्छा है ये सबको यथार्थ में भी मिले , मिलता रहे !

*कुमार राकेश

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