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अति लोभ वर्जयेत..

*प्रस्तुति -सरोज कुमारी।
एक बड़ा जमींदार था। उसके मन में आया कि अपनी कुछ जमीन गरीबों को बांटनी चाहिये। एक लोभी मनुष्य उसके पास पहुंचा और कहने लगा, “मुझे जमीन चाहिये।” जमींदार ने कहा, “ठीक बात है, सूर्योदय से चलना प्रारंभ करो। सूर्यास्त तक वहीं वापस लौटो। उस घेरे में जितनी भी जमीन आ जायगी, वह सब तुम्हारी होगी।”

प्रारंभ के स्थान पर निशान गाडकर वह आदमी चलने लगा। उसने सोचा कि बड़ा लम्बा घेरा लूंगा तब बहुत अधिक जमीन मिलेगी। वह दौड़ा बिना रुके, बिना विश्राम किये वह दौड़ता रहा। भोजन तो क्या उसने पानी तक नहीं पिया। अभी वह बिना मुड़े आगे ही बढ़ता जा रहा था। जब सूरज भगवान अस्ताचल की ओर झुके, तब वह घबराया। मैं तो बहुत दूर चला आया हूं, अब सूर्यास्त के पूर्व प्रारंभ के स्थान पर भला कैसे पहुंचूंगा ? वहां तक नहीं पहुंचूंगा तो घेरा अधूरा रह जायगा और मुझे कुछ भी नहीं मिलेगा। इस कल्पना मात्र से वह बहुत व्यथित हुआ और भूखा प्यासा होते हुए भी वह जी जान से दौड़ने लगा। वह हांफने लगा। उसके पैर लड़खड़ाने लगे। उधर सूर्यास्त हो रहा था, इधर इस आदमी के प्राण भी अस्त हो रहे थे। वह मूर्च्छित हुआ और शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।

लोगों को जब पता चला तब वे वहां आ पहुंचे। उसे श्मशान में ले जाया गया। उसे गाड़ने के लिये केवल साढ़े तीन हाथ जगह पर्याप्त रही।
*शिक्षा😘
हमें लालच नहीं करना चाहिए। जितना हमें प्राप्त है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। लोभ-लालच के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, इससे अनिष्ट ही होता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

*प्रस्तुति -: सरोज कुमारी

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