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सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में राहत शिविरों की निगरानी व मुआवजा तय करने को 3 महिला जजों का बनाया पैनल

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 11अगस्त। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जांच के लिए तीन महिला न्यायाधीशों की एक समिति गठित की है, जिसे ऐसी घटनाओं पर जानकारी एकत्र करने के साथ-साथ राहत की स्थिति की निगरानी करने का काम सौंपा गया है। शिविर लगाना और पीड़ितों को मुआवजा देने का निर्णय लेना।

सीजेआई डी.वाई .चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ ने गुरुवार देर रात अपलोड किए गए अपने फैसले में समिति से पूछा, जिसमें जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति गीता मित्तल, बॉम्बे उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, न्यायमूर्ति शामिल हैं। शालिनी फणसलकर जोशी और दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति आशा मेनन – बचे हुए लोगों या उनके परिवार के सदस्यों, स्थानीय या सामुदायिक प्रतिनिधियों, राहत शिविरों, एफआईआर या मीडिया रिपोर्टों के साथ व्यक्तिगत बैठकों सहित सभी उपलब्ध स्रोतों से जानकारी एकत्र करेंगी।

पीठ ने कहा कि ऐसी समिति के गठन का उद्देश्य न्याय प्रणाली में समुदाय के विश्‍वास को बहाल करना है और दूसरा, यह सुनिश्चित करना है कि कानून का शासन बहाल हो। इसने समिति से लैंगिक हिंसा से बचे लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदमों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा, और यह सुनिश्चित किया कि विस्थापितों के लिए स्थापित राहत शिविरों में स्वच्छ राशन, बुनियादी चिकित्सा देखभाल, आवश्यक उत्पाद, मुफ्त सैनिटरी पैड हों।

समिति को राहत शिविरों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति और किसी भी जांच, लापता व्यक्तियों और शवों की बरामदगी पर अपडेट प्रदान करने के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन के प्रावधान के लिए निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया, “नोडल अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपने संबंधित राहत शिविरों में रहने वाले सभी व्यक्तियों का डेटाबेस बनाए रखें।”

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