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नागपुर से दीक्षाभूमि: दलित चेतना क्यों नहीं साध सका संघ?

नागपुर से दीक्षाभूमि: दलित चेतना क्यों नहीं साध सका संघ?

Mumbai, India - July 18, 2014: Bhartiya Janta Party President Amit Shah along with BJP Maharashtra State President Devendra Fadnavis pays tributes to B R Ambedkar statue at Deeksha Bhoomi in Nagpur, on Friday, July 18, 2014. (Photo by Sunny Shende/Hindustan Times)

समग्र समाचार सेवा
महाराष्ट्र, 26 जुलाई-महाराष्ट्र में दलित राजनीति की अपनी एक विशिष्ट पहचान है – विचारधारा, संस्कृति और ऐतिहासिक संघर्षों से उपजी चेतना जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कभी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। नागपुर, जहाँ संघ का जन्म हुआ, वहीं से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित दीक्षाभूमि इस वैचारिक दूरी का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

बीते सौ वर्षों में हिंदू एकता की जो परियोजना RSS ने चलाई, वह उत्तर भारत और OBC वोटबैंक में सफल हुई, पर महाराष्ट्र के दलित समाज, विशेषकर महार समुदाय में न तो उसकी स्वीकार्यता बन पाई और न ही वैचारिक पहुंच।

1. वैचारिक टकराव: ‘संविधान बनाम मनुस्मृति’ का विमर्श

RSS ने “हिंदू समाज को एकजुट करने” का जो सपना देखा, उसमें दलित समुदाय को जोड़ना एक बड़ी चुनौती रहा। इसका मुख्य कारण यह है कि दलित राजनीति की वैचारिक बुनियाद ही ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरोध में खड़ी हुई थी। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने मनुस्मृति को अस्वीकार कर भारतीय संविधान को दलित मुक्ति का उपकरण बनाया।

संघ के विरोध में यह धारणा गहराती चली गई कि RSS का एजेंडा भारतीय संविधान के स्थान पर मनुस्मृति आधारित सामाजिक व्यवस्था लागू करना है। दलित बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक आंदोलनों ने इस विरोध को जनचेतना का हिस्सा बना दिया।

2. सामाजिक विभाजन का अपूर्ण लाभ

महाराष्ट्र के SC समाज में पाँच प्रमुख उपजातियाँ हैं—महार, मातंग, चर्मकार, धोबी और वाल्मीकि। इनमें महार समुदाय सबसे संगठित, शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक रहा है।

RSS ने मातंग, चर्मकार जैसी उपेक्षित उपजातियों के बीच संगठन निर्माण और नेतृत्व विकास की कोशिश की, परन्तु यह प्रयास टुकड़ों में सीमित रहा। महार समुदाय की वैचारिक प्रतिबद्धता और आंबेडकरवादी सोच को कभी भी तोड़ा नहीं जा सका।

संगठनात्मक रूप से RSS ने ‘समरसता मंच’ जैसे प्रयास किए, लेकिन यह मंच बौद्धिक विमर्श में जगह नहीं बना पाया। संघ के स्वयंसेवक आज भी मानते हैं कि “महार समुदाय में संघ का नाम लेना एक सामाजिक वर्जना है।”

3. प्रतीकात्मकता बनाम वास्तविक सशक्तिकरण

2014 के बाद केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार आने के बाद पार्टी ने कई प्रतीकात्मक कदम उठाए—आंबेडकर के लंदन स्थित घर की खरीद, इंदू मिल में स्मारक की घोषणा, और राज्यमंत्री पद पर महार नेताओं की नियुक्ति।

लेकिन ये प्रयास प्रतीकात्मक रहे, इनका जमीनी असर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी वजह थी दलित समाज के अंदर यह भावना कि ये कदम राजनीतिक लाभ के लिए हैं, न कि सामाजिक बदलाव के लिए।

2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा ने इस अविश्वास को और पुख्ता कर दिया। सरकार पर आरोप लगा कि उसने हिंदुत्व समर्थकों को बचाया और दलितों के साथ अन्याय किया। इस एक घटना ने भाजपा की वर्षों की मेहनत को नष्ट कर दिया।

4. चुनावी रणनीति की गलतफहमी

2019 में प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) ने 7% वोट लेकर UPA को नुकसान पहुँचाया और BJP को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। इससे भाजपा को यह भ्रम हो गया कि दलित वोट हमेशा विभाजित रहेंगे।

पर 2024 में यह भ्रम टूट गया। ‘संविधान खतरे में है’ जैसी भावनात्मक अपीलों ने दलित वोटों को I.N.D.I.A गठबंधन की ओर मोड़ दिया। VBA का वोट गिरकर 2.78% रह गया और दलितों ने सामूहिक रूप से भाजपा को खारिज कर दिया।

5. संगठनात्मक कमजोरी: नेतृत्व की कमी

बीजेपी का दलित मोर्चा विचारधारा से ज़्यादा चुनावी गणित का हिस्सा बना रहा। प्रतिभाशाली दलित कार्यकर्ताओं को टिकट देने में पार्टी ने हिचक दिखाई।

प्रमोद घाडे जैसे नेताओं को जब टिकट नहीं मिला, उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 23% वोट हासिल किए, जिससे भाजपा की हार हुई। यह बताता है कि पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं को पहचानने और सशक्त करने में असफल रही।

दलित नेतृत्व का विकास उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा की रणनीति का मुख्य आधार रहा है, पर महाराष्ट्र में यह पूरी तरह विफल रहा। भाजपा आज भी रामदास अठावले जैसे अप्रभावी नेताओं पर निर्भर है जिनकी स्वीकार्यता दलित युवाओं में लगभग शून्य है।

6. सांस्कृतिक और डिजिटल अपरोच का अभाव

दलित समाज में विचारों का प्रसार साहित्य से कम, गीत, संगीत, और टेलीविज़न से अधिक होता है। आनंद शिंदे, संभाजी भगत, या आंबेडकर पर आधारित मराठी धारावाहिकों का असर युवाओं पर गहरा है।

भाजपा और संघ परिवार कभी इस सांस्कृतिक जगत का हिस्सा नहीं बन पाए। न सोशल मीडिया पर, न यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों पर उनका कोई प्रभावी दलित संवादकर्मी है। इसके विपरीत, विपक्षी समूहों ने डिजिटल स्पेस में पूरी रणनीति के साथ ‘हिंदुत्व बनाम बौद्ध’ विमर्श फैलाया।

 वैचारिक संपर्क के बिना राजनीतिक समर्थन संभव नहीं

संघ परिवार की सबसे बड़ी विफलता यह रही है कि वह दलित समाज के सांस्कृतिक मनोविज्ञान, ऐतिहासिक पीड़ा और वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी समझ नहीं पाया। केवल प्रतीक, घोषणाएं और सीमित नेतृत्व से वह भरोसा नहीं जीता जा सकता जो सदियों की असमानता से उपजा है।

जब तक भाजपा और RSS दलितों के साथ संवाद, समानता और सांस्कृतिक साझेदारी के स्तर पर गहराई से नहीं जुड़ेंगे, तब तक दीक्षाभूमि संघ के लिए एक अछूता किला ही बनी रहेगी—दृष्टिगोचर अवश्य, परंतु पहुँच  से परे।

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