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मियालैंड” की माँग: असम से डिजिटल अलगाववाद की अंतरराष्ट्रीय साज़िश

मियालैंड” की माँग: असम से शुरू डिजिटल अलगाववाद की अंतरराष्ट्रीय साज़िश का पर्दाफाश

पूनम शर्मा
भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय एकता को चुनौती देने वाली एक और भयावह परछाईं आज असम की धरती पर मंडरा रही है । ‘मियालैंड’ की माँग। यह माँग केवल एक वीडियो क्लिप या किसी स्थानीय असंतोष की उपज नहीं है । बल्कि एक बहुस्तरीय डिजिटल षड्यंत्र है ।  इसका मकसद भारत को धर्म के नाम पर फिर से विभाजित करना है।
इस साजिश में शामिल हैं सोशल मीडिया नैरेटिव, कॉरपोरेट फंडिंग, अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक नेटवर्क, और राजनीतिक चुप्पी। और चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब कुछ एक स्टार्टअप मॉडल की तरह पेश किया जा रहा है । ‘डिजिटल पिचिंग’, ‘पब्लिक एंगेजमेंट’, ‘इकोसिस्टम बिल्डिंग’ और फिर ‘ग्राउंड एक्सन’।

हाल ही में एक वायरल वीडियो में एक युवक असम को बांग्लादेशी मूल के मुस्लिमों के लिए अलग “मियालैंड” देने की माँग करता नज़र आया। भले ही यह देखने में व्यक्तिगत राय लगे, लेकिन इसके पीछे की रणनीति घोर खतरनाक और संगठनात्मक है। सोशल मीडिया पर इसे एक स्क्रिप्ट की तरह फैलाया गया — पहले माँग रखी गई, फिर उसके समर्थन में ऑनलाइन नैरेटिव, फिर डिजिटल पोस्टर्स, और फिर “लोकल समर्थन” का आभास।
यह सब कुछ एक डिजिटल सेपरेटिस्ट पिच का हिस्सा है, जो भारत की क्षेत्रीय और धार्मिक संरचना को पुनः छिन्न-भिन्न करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

यह राष्ट्र को तोड़ने की साजिश यह कोई स्थानीय आंदोलन नहीं, अंतरराष्ट्रीय गहरा अभियान है

इस पूरे अभियान के पीछे एक मजबूत मलेशिया कनेक्शन सामने आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, मलेशिया की कुछ इस्लामिक संस्थाएं, NGO नेटवर्क और डिजिटल फर्म्स भारत के मुस्लिम युवाओं को “डिजिटल एक्टिविज़्म” के नाम पर प्रशिक्षित कर रही हैं। उन्हें सोशल मीडिया पर ‘नेरेटिव बिल्डिंग’, ‘रील क्रिएशन’, ‘माइंड मैनेजमेंट’ जैसे मॉड्यूल सिखाए जा रहे हैं।
यह कोई नई रणनीति नहीं है। इसी फार्मूले के तहत पाकिस्तान ने खालिस्तान, बांग्लादेश ने हिफाजत-ए-इस्लाम, और म्यांमार में रोहिंग्या संकट को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। अब यह रणनीति असम के जरिये भारत पर लागू की जा रही है।

सोशल मीडिया ,डिजिटल पिचिंग और नैरेटिव बिल्डिंग का नया “सेपरेटिस्ट मॉडल”

इस आंदोलन को देखने का तरीका बदलना होगा। यह पारंपरिक विद्रोह नहीं है, यह सोशल मीडिया के ज़रिए दिमागों में बोया गया जहर है। “एक स्टेटमेंट, एक क्लिप, और फिर उसके ऊपर लाइट्स, कैमरा, रील्स” — यही फॉर्मूला यहाँ लागू हो रहा है।
एक व्यक्ति माँग करता है
• दूसरा व्यक्ति उसका रोडमैप बताता है
• तीसरा सोशल मीडिया पर उसका प्रचार करता है
• और फिर लोग सोचने लगते हैं — क्या यह वाकई ज़रूरी है?

यही डिजिटल माइंड मैनिपुलेशन है। कॉरपोरेट्स और CSR: अनजाने में शत्रु के हाथ?

सबसे खतरनाक बात यह है कि इस अभियान को कुछ भारतीय कॉरपोरेट संस्थानों से अप्रत्यक्ष समर्थन भी मिल रहा है। एक्सिस बैंक, ICICI और कुछ बीमा कंपनियों के CSR कार्यक्रमों के अंतर्गत लोकल मुस्लिम युवाओं को टैबलेट्स, डिजिटल टूल्स और ऑनलाइन ट्रेनिंग दी जा रही है। नाम है ‘स्किल डेवलपमेंट’ ।   परिणाम निकला है ‘डिजिटल अलगाववाद’। यहाँ सवाल है — क्या भारत की निजी कंपनियाँ अनजाने में एक देशविरोधी आंदोलन को संसाधन मुहैया करा रही हैं? भारत सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए ।

सोशल मीडिया नया युद्धक्षेत्र बन चुका है

जिस तरह से इंस्टाग्राम लाइव, ट्विटर थ्रेड्स, यूट्यूब डॉक्यूमेंट्रीज़ और टेलीग्राम चैनलों पर ‘मियालैंड’ का नैरेटिव चलाया जा रहा है, वह किसी मिलिट्री ऑपरेशन से कम नहीं। यह साजिश भारत की अस्मिता के खिलाफ छेड़ा गया एक सॉफ्ट पॉवर युद्ध है।
पहले बम चलते थे, अब ट्रेंडिंग हैशटैग चलते हैं। पहले आतंकी शिविर बनते थे, अब डिजिटल स्टूडियो और रीजनल पब्लिशिंग हाउस बनाए जा रहे हैं।

असम भारत का दरवाज़ा है — खतरा बेहद गंभीर

असम की भौगोलिक स्थिति, म्यांमार, बांग्लादेश और चीन की सीमाओं के कारण पहले से ही संवेदनशील है। अब यदि वहाँ कोई धार्मिक आधार पर भूभाग की माँग करता है । तो वह सिर्फ असम का मुद्दा नहीं रह जाता ।  वह भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सीधा हमला बन जाता है।
“मियालैंड” की माँग सिर्फ एक वीडियो नहीं है, यह भारत को भीतर से तोड़ने की डिजिटल तैयारी का पहला कदम है।

अब यह लड़ाई किसी सरकार, पार्टी या एजेंसी की नहीं है। यह हर भारतीय की लड़ाई है — एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता के लिए। हमें इस मानसिक युद्ध को समझना होगा, पहचानना होगा और प्रतिरोध करना होगा।
यदि हमने इस नैरेटिव को नकार दिया, तो कल ये माँग बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में भी दोहराई जा सकती है — और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

हमारा राष्ट्रवाद तलवार नहीं, विवेक है। हमें सोशल मीडिया पर सच्चाई का प्रचार करना होगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म आज भारत को तोड़ने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं । उन्हें  हमें भारत जोड़ने के लिए हथियार बनाना होगा।

“भारतभूमि” ही अंतिम सत्य है

“मियालैंड” की माँग एक परीक्षण है — हमारी सजगता, एकता और राष्ट्रभक्ति का। असम की मिट्टी भारत की मिट्टी है, कोई धर्म, कोई बाहरी ताकत इसे अलग नहीं कर सकती।
हर भारतीय को यह शपथ लेनी होगी:
“भारत के टुकड़े नहीं होने देंगे, चाहे कोई भी साजिश हो।”

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