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बिहार मतदाता सूची: सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, नहीं बढ़ी समय सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने इंफोसिस की अपील खारिज की, कन्नड़ अनुवाद का बहाना नहीं माना

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 02 सितंबर 2025: बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटाने की अंतिम समय सीमा को 1 सितंबर से आगे बढ़ाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यह फैसला राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और अन्य याचिकाकर्ताओं के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जो यह समय सीमा बढ़ाने की मांग कर रहे थे।

दरअसल, याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई थी कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं, और 1 सितंबर तक सभी दावों और आपत्तियों को दाखिल करना संभव नहीं है। उनका तर्क था कि इस प्रक्रिया में और समय की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी योग्य मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए।

दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर बताया कि समय सीमा बढ़ाने से पुनरीक्षण कार्यक्रम में अनावश्यक देरी होगी और चुनाव की पूरी प्रक्रिया बाधित हो जाएगी। चुनाव आयोग ने अदालत को आश्वासन दिया कि 1 सितंबर के बाद भी प्राप्त होने वाले सभी वैध दावों और आपत्तियों पर विचार किया जाएगा। आयोग ने यह भी कहा कि नाम जोड़ने, हटाने और संशोधित करने की यह प्रक्रिया नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि तक जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार करते हुए समय सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया।

इस मामले की सुनवाई के दौरान, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किया। कोर्ट ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (BLSA) को निर्देश दिया कि वे मतदाताओं और राजनीतिक दलों की मदद के लिए ‘पैरा-लीगल वालंटियर’ की तैनाती करें। ये वालंटियर लोगों को ऑनलाइन दावे, आपत्तियां और संशोधन दाखिल करने में सहायता करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि हर वालंटियर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश को एक गोपनीय रिपोर्ट सौंपनी होगी, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बिहार की राजनीति में मतदाता सूची को लेकर गहमा-गहमी बनी हुई है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि मतदाता सूची से विशेष रूप से हाशिए के समुदायों से संबंधित लाखों योग्य मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि यह अभियान केवल मृत, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट नामों को हटाने के लिए चलाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम अपने निर्धारित समय पर ही पूरा होगा। हालांकि, चुनाव आयोग के आश्वासन और कोर्ट के निर्देशों ने यह उम्मीद जगाई है कि कोई भी योग्य मतदाता अपने मताधिकार से वंचित नहीं रहेगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल और मतदाता इस नई व्यवस्था का कैसे उपयोग करते हैं और क्या यह पुनरीक्षण प्रक्रिया शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से पूरी होती है।

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