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‘अपनी मातृभूमि के लिए जान दे देंगे पर वंदेमातरम नहीं गाएँगे’: एसटी हसन

समग्र समाचार सेवा
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश, 09 नवंबर: इन दिनों पूरे देश में राष्ट्र गीत वंदेमातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक स्थलों पर बड़े उत्साह के साथ वंदेमातरम का गायन किया जा रहा है। इसी माहौल के बीच, मुरादाबाद लोकसभा के पूर्व समाजवादी पार्टी (सपा) सांसद डॉ. एस.टी. हसन ने एक बयान दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

मीडिया से बातचीत में डॉ. हसन ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह देश के सच्चे देशभक्त हैं और अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जान भी न्योछावर कर सकते हैं। हालाँकि, उन्होंने साफ किया कि वह वंदेमातरम का गायन नहीं कर सकते हैं। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इस पर प्रतिक्रियाएँ भी आ रही हैं।

पूजा और इबादत का सवाल: इस्लाम की मान्यता

डॉ. एस.टी. हसन ने वंदेमातरम नहीं गाने के पीछे की धार्मिक वजह बताई। उन्होंने कहा, “मुसलमान अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत नहीं कर सकता। इस्लाम में जमीन या किसी अन्य वस्तु की पूजा करने की अनुमति नहीं है।”

उन्होंने समझाया कि चूंकि वंदेमातरम में ‘धरती’ को माँ मानकर उसकी पूजा या वंदना करने का भाव निहित है, इसलिए एक मुसलमान होने के नाते, वह अल्लाह के अलावा किसी अन्य की पूजा नहीं कर सकते। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी यह भावना देशभक्ति के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उनकी धार्मिक आस्था का विषय है। उन्होंने अपनी देशभक्ति को प्रमाणित करते हुए दोहराया कि वह देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर सकते हैं, लेकिन इबादत (पूजा) केवल अल्लाह के लिए ही कर सकते हैं।

बयान के पीछे राजनीतिक सवाल

डॉ. एस.टी. हसन ने इस पुराने विवाद को वर्तमान राजनीतिक संदर्भ से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि वंदेमातरम को लेकर विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि यह मुद्दा लगभग सौ साल पुराना है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में इतनी गंभीर समस्याएँ हैं, तब इस मुद्दे को अभी क्यों उठाया जा रहा है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस तरह के मुद्दे को उठाने का समय बिहार चुनाव से ठीक पहले क्यों चुना गया। उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा, “देश में हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा कौन उठा रहा है? यह बात सबको मालूम है।” हसन ने सरकार से अपील की कि वह इस तरह की सियासत से बाज आए और समाज को बाँटने वाले मुद्दों को छोड़कर देश के वास्तविक विकास और जनहित के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करे। उनके इस बयान ने जहाँ एक ओर भाजपा जैसे दलों को निशाना साधने का मौका दिया है, वहीं दूसरी ओर सपा ने अपने नेता के बयान से दूरी नहीं बनाई है, बल्कि इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जा रहा है।

यह विवाद एक बार फिर देशभक्ति और धार्मिक आस्था के बीच के नाजुक संतुलन पर बहस छेड़ रहा है। जहां एक वर्ग इसे राष्ट्रवाद से जोड़कर देखता है, वहीं दूसरा वर्ग इसे अपनी आस्था के संवैधानिक अधिकार के रूप में देखता है।

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