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दिल्ली-एनसीआर की हवा खतरनाक, स्वास्थ्य आपातकाल जैसे हालात

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 19 नवंबर: दिल्ली-एनसीआर की हवा एक बार फिर जानलेवा स्तर पर पहुंच गई है। राजधानी में मंगलवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 374 दर्ज किया गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है। AIIMS के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने वर्तमान स्थिति को सीधे-सीधे स्वास्थ्य आपातकाल (Health Emergency) बताया है। उनका कहना है कि जिस स्तर पर प्रदूषण कई दिनों से बना हुआ है, उससे सामान्य और संवेदनशील दोनों प्रकार के लोगों पर गंभीर असर पड़ रहा है।

AIIMS के पल्मोनरी विभागाध्यक्ष डॉ. अनंत मोहन के अनुसार, सांस और अस्थमा के ऐसे कई मरीज जो पहले स्थिर थे, अब बढ़ी हुई तकलीफ के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं। पहले जो खांसी कुछ दिनों में ठीक हो जाती थी, अब हफ्तों तक चल रही है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल नहीं माना जाएगा, तब तक स्थिति काबू में नहीं आएगी।

डॉ. सौरभ मित्तल, सहायक प्रोफेसर, AIIMS, ने सलाह दी है कि ऐसे मौसम में N-95 मास्क ही सबसे असरदार सुरक्षा है। उनके अनुसार, व्यक्तिगत स्तर पर संरक्षण के लिए मास्क का इस्तेमाल अनिवार्य हो चुका है। वहीं AIIMS के पूर्व विशेषज्ञ डॉ. गोपी चंद खिलनानी ने हाल में सुझाव दिया था कि दिसंबर के अंत में लोग कुछ समय के लिए दिल्ली छोड़ने पर विचार करें, ताकि श्वसन संबंधी समस्याओं से राहत मिल सके।

प्रदूषण से कितने दिनों में क्या असर पड़ता है?

1–3 दिन

गले, आंख और नाक में जलन, सिरदर्द, थकान और हल्की सांस लेने में परेशानी।

4–7 दिन

तीव्र खांसी, अस्थमा रोगियों में अटैक की संभावना, रक्तचाप बढ़ सकता है।

8–15 दिन

ब्रोंकाइटिस जैसे लक्षण, बच्चों के फेफड़ों की ग्रोथ पर असर शुरू।

30 दिन या उससे अधिक

अस्थमा स्थायी रूप से बिगड़ सकता है, बच्चों की फेफड़ों की क्षमता 10–20% तक कम होने का खतरा।

COPD का बढ़ता खतरा: नौ में से एक भारतीय प्रभावित

प्रदूषण, धूम्रपान और घरेलू बायोमास ईंधन के कारण COPD (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) तेजी से बढ़ रही है। हाल ही में लैंसेट और JAMA में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार:

डॉ. विवेक नांगिया (मैक्स अस्पताल) ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण पर काबू नहीं पाया गया तो बच्चे अस्थमा और COPD की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे हृदय रोग का खतरा भी बढ़ जाता है।

भविष्य में राहत की उम्मीद

JAMA के शोध के मुताबिक अगले 25 वर्षों में भारत में COPD का बोझ 2% तक घट सकता है, जिसकी वजह है,

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