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बार-बार फैसले खोलने की प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था के लिए ख़तरा-सुप्रीम कोर्ट

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 27 नवंबर: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (27 नवंबर) को कहा कि हाल के दिनों में एक गलत और खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ रही है, लोग पुराने और तय हो चुके फैसलों को नई पीठों के सामने दोबारा उठाने लगे हैं। कोर्ट ने इस पर गहरी चिंता जताई और कहा कि यह तरीका न्याय व्यवस्था की अंतिमता, यानी फैसले के खत्म हो जाने के सिद्धांत, को नुकसान पहुंचाता है।

यह चेतावनी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने दी। यह पीठ 2019 के एक हत्या मामले में जमानत की शर्त बदलने की अर्जी सुन रही थी। इस दौरान उन्होंने कहा कि अब कई लोग नई बनी पीठों के पास जाकर पुराने फैसलों को बदलवाने की कोशिश करते हैं, जो बिल्कुल गलत है।

कोर्ट ने कहा कि जब कोई फैसला सुना दिया जाता है, तो मामला वहीं समाप्त माना जाता है। लेकिन यदि लोग बार-बार यह उम्मीद लेकर आएं कि नई पीठ उनका पक्ष बदल देगी, तो इससे न्याय व्यवस्था में अनिश्चितता और अव्यवस्था पैदा होगी।

न्यायालय ने बताया कि कुछ लोग जान-बूझकर अलग-अलग पीठों के पास जाते हैं ताकि उन्हें अपनी पसंद का फैसला मिल जाए। इसे कोर्ट ने “पीठ खोजने की कोशिश” कहा और इसे अत्यंत हानिकारक बताया। अदालत ने कहा कि अगर यह चलन बढ़ता रहा, तो ऐसा लगेगा कि न्यायाधीश बदलते ही फैसला भी बदल सकता है, और इससे जनता का भरोसा टूटेगा।

संविधान के अनुच्छेद 141 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरे देश की सभी अदालतों पर लागू होता है। इसलिए इन फैसलों को बार-बार बदलवाने की कोशिश न्यायिक अधिकार को कमजोर करती है।

अंत में, न्यायालय ने जमानत शर्त बदलने की अर्जी खारिज कर दी और कहा कि ऐसा करना गलत संदेश देगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने ही पहले फैसलों को स्थिर नहीं मानता।

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