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आयाराम गयाराम संस्कार दिव्य ज्ञान पाकर कांग्रेस छोड़ने वालों की नई राष्ट्रीयता

आयाराम गयाराम संस्कार दिव्य ज्ञान पाकर कांग्रेस छोड़ने वालों की नई राष्ट्रीयता

पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति में ग्रह-नक्षत्र अक्सर ऐसे चाल चलते हैं कि बड़े-बड़े नेता अचानक “दिव्य ज्ञान” प्राप्त कर लेते हैं। कल तक जो पार्टी, विचारधारा और नेता के लिए जान देने को तैयार थे, अगले ही दिन स्नान कर गंगाजल से “शुद्ध” होकर किसी दूसरी पार्टी के आश्रम में दिखाई देते हैं। यही हुआ असम में, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रकीबुल हुसैन पर अचानक “राजनीतिक ज्ञान” की वर्षा होने लगी और एक झटके में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।

दिल्ली से लेकर दिसपुर तक यह दृश्य नया नहीं है, लेकिन जिस नाटकीयता के साथ यह सब हो रहा है, उसने भाजपा कार्यालय में मानो त्योहार जैसा माहौल बना दिया। थाली तैयार है, आरती भी शुरू हो चुकी है—क्योंकि एक और “ज्ञानी” कांग्रेस से निकलकर भाजपा के शरणागति शिविर में पहुंच चुका है।

आयाराम-गयाराम: भारतीय राजनीति का पुराना सच

राजनीति में पार्टी बदलना कोई असामान्य घटना नहीं। लोग आते हैं, जाते हैं—यह परंपरा आज की नहीं, आजादी के शुरुआती दशकों से चली आ रही है। लेकिन चिंता तब होती है जब कोई नेता अपनी पुरानी पार्टी पर आग उगलते हुए नई पार्टी के लिए ज्ञान का दीपक जलाने लगता है।

कहावत है—“जिस थाली में खाते हो, उसी में छेद मत करो”, लेकिन आज के नेता थाली के साथ-साथ पूरा किचन उठा कर बदल देते हैं।

रकीबुल हुसैन: ‘कांग्रेस का दर्द’ और ‘नया ज्ञान’

जिस कांग्रेस का हिस्सा बनकर उन्होंने दशकों तक सत्ता और पद का आनंद लिया, अचानक वही कांग्रेस उन्हें दुश्मन नजर आने लगती है।

चुनावी भाषणों में जिन शब्दों का प्रयोग उन्होंने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए किया, अब वही बातें इतने बोझ बन गईं कि तत्काल “ज्ञान प्राप्ति” हुई और भाजपा के द्वार खुल गए।

एक वायरल वीडियो में यह “पूर्व कांग्रेस नेता” कहते दिखे—
“तरुण गोगोई के समय कांग्रेस में बहुत खुशी थी। रकीबुल ने कांग्रेस को बर्बाद कर दिया। कोई भी गौरवशाली असमी अब कांग्रेस में नहीं रह सकता।”तो सवाल उठता है—
क्या यह ‘मानसिक चोट’ थी? या सत्ता के समीकरणों का नया खेल? या फिर वही पुराना राजनीतिक गणित—जहाँ सत्ता की दिशा देखकर नेता दिशा बदल लेते हैं?

855 शहीदों का इतिहास और अचानक उठी ‘अस्मिता’

असम आंदोलन में 855 युवाओं ने बलिदान दिया था। लेकिन तब भी कांग्रेस के भीतर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधि मंत्री बनते रहे। तब किसी को “असमी अस्मिता” नहीं दिखाई दी। तरुण गोगोई के समय में—मध्य असम, निचला असम और आंशिक उत्तर असम में बांग्लादेशी आबादी का बढ़ता प्रभाव

अवैध घुसपैठ के खिलाफ आवाजें दबाई जाती रहीं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खामोश बैठे रहे आज वही लोग अचानक “Proud Assamese” बनने का नाटक कर रहे हैं—यह व्यवहार जनता के लिए पचने वाला नहीं है।

अब अचानक दिखाई देगा राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और असम की अस्मिता का पाठ

जो नेता कल तक कांग्रेस के मंच से राजनीति कर रहे थे, वे आज भाजपा के सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी मंच पर खड़े होकर जनता को ‘नैतिकता’, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘हिंदुत्व’ की शिक्षा देंगे। यह दृश्य हास्यास्पद भी है और विडंबनापूर्ण भी। जनता बेवकूफ नहीं है—उसे पता है कि यह सब अचानक जागा हुआ “दिव्य ज्ञान” नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसरवाद है।

भाजपा में कांग्रेसियों की भीड़—‘BJP Refugee Camp’ का व्यंग्य

असम भाजपा में कांग्रेस से आए नेताओं की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि लोग इसे मजाक में “Refugee Camp” कहने लगे हैं। जो भी कांग्रेस छोड़ता है, वह सीधा भाजपा के शिविर में ‘शरणार्थी’ बनकर प्रवेश कर जाता है—ना कोई विचारधारा की परीक्षा, ना कोई सिद्धांत की कसौटी। मुख्य बात सिर्फ सत्ता के समीकरण हैं।

जनता का वास्तविक दर्द: पाखंड और नाटक

राजनीति में नेता आते-जाते रहेंगे—यह लोकतंत्र है। लेकिन जनता पाखंड को कभी माफ नहीं करती। कांग्रेस में रहते हुए ‘अस्मिता’ न दिखे,
सत्ता से दूरी होने पर अचानक ‘राष्ट्रवाद’ जाग जाए, और पार्टी छोड़ते ही नैतिकता का बड़ा भाषण शुरू हो जाए— यह सब देखकर जनता कह रही है—“बस करो, अब और नहीं!”

आयाराम-गयाराम तो चलेंगे, लेकिन पाखंड नहीं चलेगा

असम में जो हो रहा है, वह पूरे भारत में हर राज्य में दिखाई देता है।नेता बदलते हैं—यह राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। लेकिन जब वही नेता पार्टी बदलने के बाद नैतिकता का प्रवचन देने लगते हैं, तो जनता इसका समर्थन नहीं करती। यह लेख किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि जनता की समझदारी के लिए है। लोग जानते हैं कि कौन सिद्धांत पर चलता है और कौन अवसरवाद की पालकी में बैठा है।

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