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आजादी के 14 साल बाद भारत में शामिल हुआ था गोवा

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 19 दिसंबर: गोवा मुक्ति दिवस के मौके पर यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है कि आजादी के बाद गोवा को भारत में शामिल करने के लिए 14 साल का इंतजार क्यों करना पड़ा। 19 दिसंबर 1961 को गोवा भारत का हिस्सा बना, लेकिन इसके पीछे लंबा राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य संघर्ष छिपा हुआ है।

गोवा वर्ष 1510 से पुर्तगाली शासन के अधीन था। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन गोवा, दमन और दीव पुर्तगाल के कब्जे में ही बने रहे। उस समय भारत को विभाजन की त्रासदी और कश्मीर युद्ध जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था, जिससे तत्काल सैन्य कार्रवाई संभव नहीं हो सकी।

गोवा मुक्ति आंदोलन पहले से ही सक्रिय था। ट्रिस्टाओ डी ब्रागांका कुन्हा ने 1928 में गोवा राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। 1946 में डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में आंदोलन ने जोर पकड़ा। हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अंतरराष्ट्रीय छवि और वैश्विक प्रतिक्रिया को लेकर सतर्क थे और उन्होंने शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में राज्यसभा में नेहरू की इसी नीति की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि नेहरू को डर था कि सैन्य कार्रवाई से उनकी वैश्विक शांति नेता की छवि प्रभावित होगी। मोदी ने नेहरू के 1955 के स्वतंत्रता दिवस भाषण का हवाला देते हुए सत्याग्रहियों को समर्थन न देने का आरोप लगाया था।

हालांकि, समय के साथ हालात बदले। पुर्तगाल की हठधर्मिता, गोवा में गोलीबारी की घटनाएं और अफ्रीकी उपनिवेशों का दबाव बढ़ता गया। 1 दिसंबर 1961 को भारत ने ऑपरेशन चटनी के तहत निगरानी और सैन्य तैयारी शुरू की।

इसके बाद 17 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। थलसेना, नौसेना और वायुसेना के संयुक्त अभियान के तहत 19 दिसंबर को पुर्तगाली गवर्नर जनरल वासालो ई सिल्वा ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही गोवा, दमन और दीव भारत का अभिन्न हिस्सा बन गए और 400 साल पुराने पुर्तगाली शासन का अंत हुआ।

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