Site icon Samagra Bharat News website

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला: ताक़त की राजनीति

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला: ताक़त की राजनीति

पूनम शर्मा
नए साल की शुरुआत वेनेजुएला के लिए बमों, आग और अनिश्चितता के साथ हुई। अमेरिकी हवाई हमलों, सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी की खबरों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आज की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और मानवाधिकारों की वास्तविक हैसियत क्या रह गई है। क्या ये सिद्धांत अब सिर्फ़ काग़ज़ों और भाषणों तक सीमित हैं, जबकि असली दुनिया में फ़ैसले ताक़त के दम पर लिए जा रहे हैं?

लोकतंत्र की रक्षा

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने वेनेजुएला के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की है, वह अचानक या अप्रत्याशित नहीं है। यह उस लंबी नीति की अगली कड़ी है, जिसमें अमेरिका उन सरकारों को निशाना बनाता है जो उसकी राजनीतिक और आर्थिक इच्छाओं के अनुरूप नहीं चलतीं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि ट्रंप इस आक्रामकता को छिपाने की कोशिश नहीं करते। जहां पहले इसे “लोकतंत्र की रक्षा” या “मानवाधिकारों के संरक्षण” की भाषा में लपेटा जाता था, वहीं ट्रंप के दौर में ताक़त का प्रदर्शन ज़्यादा खुला और बेधड़क है।

वेनेजुएला कोई साधारण देश नहीं है। तेल से समृद्ध यह राष्ट्र लंबे समय से अमेरिकी रणनीति का हिस्सा रहा है। ह्यूगो चावेज़ के दौर से ही, जब वेनेजुएला ने समाजवादी नीतियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अमेरिकी प्रभाव से दूरी की बात की, तब से वह वॉशिंगटन की आंखों की किरकिरी बन गया। निकोलस मादुरो उसी राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं, और अमेरिका के लिए यही पर्याप्त कारण है कि उन्हें “ख़तरा” घोषित किया जाए।

मादुरो पर “नार्को-आतंकवाद” जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं और उनकी गिरफ्तारी को अमेरिकी कानून के तहत सही ठहराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि मादुरो की सरकार निर्दोष है या दोषी। असली सवाल यह है कि किसे यह अधिकार है कि वह किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को पकड़कर अपने देश ले जाए? अगर यही नियम है, तो फिर दुनिया के कई ताक़तवर नेताओं को भी इसी कसौटी पर क्यों नहीं परखा जाता?

अमेरिकी दोहरे मानदंड

यहाँ  अमेरिकी दोहरे मानदंड साफ़ दिखाई देते हैं। जिन देशों या नेताओं से अमेरिका को राजनीतिक या रणनीतिक लाभ मिलता है, उनके अपराधों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वहीं जो नेता अमेरिकी हितों के आड़े आते हैं, वे अचानक तानाशाह, अपराधी और वैश्विक खतरे घोषित कर दिए जाते हैं। यह नैतिकता नहीं, बल्कि चयनात्मक न्याय है।

वेनेजुएला की त्रासदी सिर्फ़ बमबारी तक सीमित नहीं है। वर्षों से लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने वहां की आम जनता की ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। दवाइयों की कमी, महंगाई, बेरोज़गारी और बुनियादी ज़रूरतों का संकट—इन सबका बोझ सरकार से ज़्यादा आम नागरिकों ने उठाया है। जब आर्थिक प्रतिबंधों से ही हज़ारों लोग जान गंवा चुके हों, तो सैन्य हमला उस पीड़ा को और गहरा कर देता है।

इतिहास पर नज़र डालें तो यह पैटर्न नया नहीं है। पनामा के मैनुएल नोरिएगा हों या इराक के सद्दाम हुसैन—पहले सहयोग, फिर दुश्मनी और अंत में सैन्य हस्तक्षेप। हर बार तर्क अलग बताया गया, लेकिन नतीजा लगभग एक जैसा रहा: तबाही, अस्थिरता और लंबे समय तक चलने वाला मानवीय संकट। इराक आज भी 2003 के युद्ध के घावों से उबर नहीं पाया है। लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान इसके और उदाहरण हैं।

अमेरिका अक्सर यह दावा करता है कि वह वैश्विक व्यवस्था और कानून का रक्षक है। लेकिन जब वही देश अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक़ पर रखकर कार्रवाई करता है, तो उस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर नियम सिर्फ़ कमज़ोर देशों पर लागू हों और ताक़तवर देश उनसे ऊपर हों, तो यह व्यवस्था न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।

वेनेजुएला पर हमला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज की दुनिया किस दिशा में जा रही है। क्या हम एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जहां ताक़त ही सबसे बड़ा कानून होगी? जहां किसी देश की संप्रभुता उसकी सैन्य और आर्थिक हैसियत पर निर्भर करेगी?

निष्कर्ष

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि भविष्य के लिए यह एक ख़तरनाक मिसाल बन सकता है। अगर आज वेनेजुएला है, तो कल कोई और देश हो सकता है। जब जवाबदेही ख़त्म हो जाती है, तो आक्रामकता को रोकने वाला कोई नहीं बचता।

वेनेजुएला की कहानी सिर्फ़ एक देश की कहानी नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था का आईना है, जहां न्याय और कानून की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन फ़ैसले अब भी ताक़त के तराज़ू पर तौले जाते हैं।

Exit mobile version