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हरिद्वार कुंभ क्षेत्र की पवित्रता को लेकर उठी मांग,सरकार कर रही है पहलुओं का अध्ययन

 

समग्र समाचार सेवा
हरिद्वार | 09 जनवरी: प्रस्तावित कुंभ मेला 2027 से पहले हरिद्वार में कुंभ क्षेत्र और प्रमुख गंगा घाटों से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है। गंगा सभा और कुछ संतों की ओर से यह मांग सामने आई है कि कुंभ मेला क्षेत्र में परंपरागत नियमों के अनुरूप व्यवस्थाएं लागू की जाएं, जिससे धार्मिक मर्यादा और पवित्रता बनी रहे।

इस मांग के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि विषय संवेदनशील है और इस पर कानूनी व सामाजिक दृष्टि से अध्ययन किया जा रहा है।

गंगा सभा का पक्ष: ऐतिहासिक व्यवस्था का हवाला

हर-की-पौड़ी घाट के रखरखाव से जुड़ी गंगा सभा का कहना है कि हरिद्वार सनातन परंपरा का प्रमुख तीर्थ है। गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम के अनुसार, वर्ष 1916 में गंगा सभा और तीर्थ पुरोहितों की मांग पर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने नगरपालिका उपविधियां (बायलॉज) बनाई थीं।

उनके मुताबिक इन बायलॉज के तहत हर-की-पौड़ी सहित कुछ पवित्र घाटों और क्षेत्रों में विशेष धार्मिक व्यवस्थाएं लागू की गई थीं, जिनका उद्देश्य गंगा घाटों की पवित्रता बनाए रखना था। गंगा सभा का दावा है कि ये नियम आज भी प्रभावी हैं।

गौतम का कहना है कि उस दौर में श्रद्धालुओं की संख्या सीमित थी, लेकिन वर्तमान समय में हरिद्वार में सालभर और विशेषकर कुंभ के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में बड़े क्षेत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर व्यवस्थाएं लागू करना आवश्यक हो गया है।

कुंभ क्षेत्र को लेकर मांग

गंगा सभा का तर्क है कि सरकार द्वारा घोषित कुंभ क्षेत्र में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों और गंगा घाटों पर परंपरागत नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यह मांग किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि आस्था, सुरक्षा और धार्मिक पवित्रता को बनाए रखने के उद्देश्य से रखी गई है।

संत समाज का समर्थन


संत समाज से जुड़े कई महंतों ने गंगा सभा की इस मांग का समर्थन किया है। संतों का कहना है कि सरकार पहले से ही धार्मिक स्थलों की पहचान और शुद्धता बनाए रखने के लिए काम कर रही है। ऐसे में यदि कुंभ नगरी में परंपरागत नियमों को सख्ती से लागू किया जाता है, तो संत समाज इसका समर्थन करेगा।

संतों के अनुसार कुंभ केवल आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का प्रतीक है और इसकी व्यवस्थाएं उसी भावना के अनुरूप होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री का रुख: संतुलित और संवैधानिक दृष्टि


इस पूरे मुद्दे पर पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि हरिद्वार ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है और उसकी पवित्रता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री के अनुसार, जब इस तरह की मांग सामने आई है, तो सरकार सभी कानूनी प्रावधानों, पुराने एक्ट और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन कर रही है।

मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य किसी भी निर्णय में धार्मिक मान्यताओं, कानून और सामाजिक समरसता—तीनों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज़

इस विषय पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी सामने आई हैं। कांग्रेस विधायक काज़ी निज़ामुद्दीन का कहना है कि हर-की-पौड़ी से जुड़े बायलॉज पहले से मौजूद हैं और आम तौर पर सभी लोग उनका पालन करते हैं। उनके अनुसार मौजूदा व्यवस्था में किसी तरह का विवाद नहीं रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस समय कई जनहित के मुद्दों से जूझ रही है और ऐसे में पुराने विषयों को फिर से चर्चा में लाया जा रहा है।

बायलॉज में क्या प्रावधान हैं

हरिद्वार नगरपालिका समिति की उपविधियों में स्पष्ट उल्लेख है कि हर-की-पौड़ी सहित कुछ पवित्र गंगा घाटों पर विशेष नियम लागू हैं। दस्तावेज़ों में सार्वजनिक आचरण, प्रवेश, निषेध और उल्लंघन की स्थिति में दंड का विवरण दर्ज है।

नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, ये उपविधियां स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई थीं और इन्हें तत्कालीन सरकार की स्वीकृति प्राप्त थी। इनका उद्देश्य घाटों और पूजा स्थलों की धार्मिक मर्यादा बनाए रखना था।

कुंभ 2027 से पहले अहम फैसला

फिलहाल यह मुद्दा हरिद्वार ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बना हुआ है। कुंभ मेला 2027 जैसे विशाल आयोजन से पहले सरकार क्या निर्णय लेती है, यह आने वाले समय में राज्य के सामाजिक और धार्मिक माहौल की दिशा तय करेगा।

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