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ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान: चीन नाराज़, रूस संतुष्ट आख़िर वजह क्या है?

समग्र समाचार सेवा
वॉशिंगटन/कोपेनहेगन। 20 जनवरी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए हालिया बयानों ने वैश्विक राजनीति में हलचल तेज़ कर दी है। ट्रंप का कहना है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं बढ़ाया, तो रूस और चीन इस आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और मज़बूत कर लेंगे। उनके इस तर्क ने न सिर्फ़ यूरोप में चिंता बढ़ाई है, बल्कि चीन और रूस की प्रतिक्रियाओं में भी साफ़ अंतर दिखा है।

ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत

ग्रीनलैंड, डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। आर्कटिक में इसकी भौगोलिक स्थिति इसे सैन्य निगरानी, समुद्री मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज़ से बेहद अहम बनाती है। इसी कारण यह इलाका वैश्विक शक्तियों की रणनीतिक योजनाओं के केंद्र में है।

ट्रंप की चेतावनी और टैरिफ़ का संकेत

ट्रंप ने साफ़ किया है कि अगर उनके प्रस्तावित क़दमों का विरोध करने वाले यूरोपीय देश पीछे नहीं हटते, तो अमेरिका नए व्यापारिक शुल्क लगाने पर विचार कर सकता है। इस बयान ने अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है।

चीन का कड़ा विरोध

चीन ने ट्रंप के दावों पर कड़ी आपत्ति जताई है। बीजिंग का कहना है कि अमेरिका अपने हित साधने के लिए तथाकथित ‘चीनी ख़तरे’ को बहाने के रूप में पेश कर रहा है। चीन का तर्क है कि वह आर्कटिक क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत, जलवायु संरक्षण और वैज्ञानिक शोध के उद्देश्य से सक्रिय रहा है, न कि किसी क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करने के इरादे से।

चीनी मीडिया में यह भी कहा गया है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की बयानबाज़ी यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में बढ़ती अनिश्चितता को उजागर करती है।

रूस की संतुष्टि के पीछे कारण

इसके उलट, रूस में ट्रंप के रुख़ को लेकर सकारात्मक टिप्पणियाँ सामने आई हैं। रूसी विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता टकराव पश्चिमी गठबंधन को कमज़ोर कर सकता है।

रूस के लिए यह स्थिति इसलिए अनुकूल मानी जा रही है क्योंकि इससे ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों और नाटो की एकजुटता पर दबाव बढ़ता है। पश्चिमी देशों में किसी भी तरह की दरार को मॉस्को अपने रणनीतिक हितों के लिए फ़ायदेमंद मानता है।

आर्कटिक में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा

विशेषज्ञों के मुताबिक़ ग्रीनलैंड विवाद केवल एक द्वीप तक सीमित नहीं है। यह आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों, सैन्य मौजूदगी और वैश्विक प्रभाव को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा का संकेत है। जहाँ चीन अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संप्रभुता की बात कर रहा है, वहीं रूस पश्चिमी देशों के आपसी मतभेदों को अवसर के रूप में देख रहा है।

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