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भारत–EU FTA 2026: वैश्विक रणनीति की नई धुरी

पूनम शर्मा
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 2026 को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहना अतिशयोक्ति नहीं है। यह केवल व्यापारिक करार नहीं बल्कि भारत की वैश्विक रणनीति का पुनर्परिभाषण है। इस समझौते ने भारत को यूरोप की आर्थिक धुरी से जोड़ते हुए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने का अवसर दिया है।

97 प्रतिशत टैरिफ लाइनों का खुलना: निर्यात को नई उड़ान

इस FTA का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यूरोपीय संघ ने अपने 97% टैरिफ लाइनों को खोलने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे भारत के लगभग सभी प्रमुख निर्यात को लाभ मिलेगा। वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण और कृषि उत्पादों पर शुल्क घटने से भारतीय MSME और किसानों को सीधा फायदा होगा। सेवा क्षेत्र में भी IT, डिजिटल, शिक्षा और पेशेवर सेवाओं के लिए यूरोपीय बाज़ार खुल जाएगा। साथ ही, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी और हेल्थकेयर में यूरोपीय निवेश भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देगा।

EU के सख्त मानक: अवसर के साथ चुनौती

हालाँकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। यूरोपीय संघ की सख्त पर्यावरणीय और स्थिरता नीतियाँ जैसे CBAM (कार्बन बॉर्डर टैक्स), EUDR (डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन) और CSDDD (कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस) भारतीय उद्योगों के लिए बाधा बन सकती हैं। छोटे उद्योगों और MSME को इन मानकों के अनुरूप ढलने में कठिनाई होगी। कृषि और डेयरी सेक्टर भी यूरोपीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हो सकते हैं।

अमेरिका बनाम यूरोप: भारत के लिए कौन ज़्यादा रणनीतिक

अगर अमेरिका से तुलना करें तो भारत–EU FTA कहीं अधिक व्यापक और रणनीतिक है। अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध अभी भी कई उत्पादों पर उच्च शुल्क और वीज़ा/IPR विवादों से घिरे हैं। वहीं EU ने भारत को सप्लाई चेन का केंद्र बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। निवेश के अवसर भी यूरोप में ग्रीन एनर्जी और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अधिक हैं, जबकि अमेरिका का सहयोग रक्षा और डिजिटल सेक्टर तक सीमित है।

निष्कर्ष: भारत की नई वैश्विक आर्थिक दिशा

निष्कर्षतः, भारत–EU FTA 2026 केवल व्यापारिक करार नहीं बल्कि भारत की नई वैश्विक रणनीति है। यह भारत को यूरोप की आर्थिक धुरी से जोड़ते हुए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने का अवसर देता है। चुनौतियाँ ज़रूर हैं, लेकिन यदि भारत अपने MSME, कृषि और उद्योगों को EU मानकों के अनुरूप ढाल लेता है, तो यह समझौता भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थायी शक्ति बना सकता है।

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