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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 10 फरवरी : लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। यह स्वतंत्र भारत में किसी लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की चौथी कोशिश है। इससे पहले 1954 में जी.वी. मावलंकर, 1966 में सरदार हुकुम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए थे, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। मौजूदा प्रस्ताव पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। यदि यह स्वीकार किया जाता है, तो यह संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का एक और संकेत होगा।

यह कदम सरकार और विपक्ष के बीच संसदीय कार्यवाही और सदस्यों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर बढ़े तनाव के बाद उठाया गया है। विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने के पर्याप्त अवसर नहीं दिए गए और विरोध प्रदर्शन करने पर कई विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का कहना है कि नियमों का चयनात्मक इस्तेमाल हो रहा है, जिससे बहस और असहमति की जगह सिमटती जा रही है। विपक्ष इसे संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के क्षरण के रूप में देख रहा है।

विवाद की पृष्ठभूमि में चीन के गलवान घटनाक्रम से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए थे। विपक्षी दलों का दावा है कि सरकार आलोचनात्मक आवाजों को दबाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि अध्यक्ष ने सदन के सुचारू संचालन के लिए नियमों के दायरे में रहकर कार्रवाई की है और बार-बार व्यवधान के चलते अनुशासनात्मक कदम जरूरी थे।

संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए कम से कम 14 दिन का लिखित नोटिस और 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता नहीं करते और यह जिम्मेदारी उपाध्यक्ष या नामित पीठासीन अधिकारी निभाते हैं। मौजूदा संख्याबल को देखते हुए सत्तापक्ष और उसके सहयोगियों के पास बहुमत है, इसलिए इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।

इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रस्ताव अधिकतर प्रतीकात्मक और राजनीतिक संदेश देने के लिए लाए जाते हैं। किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को अब तक इस संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पद से हटाया नहीं गया है। बावजूद इसके, ओम बिरला के खिलाफ लाया गया यह प्रस्ताव सरकार और विपक्ष के बीच गहराते संस्थागत टकराव को रेखांकित करता है और संसद में कामकाज की शैली पर जारी बहस को और तेज कर देता है।

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