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क्या राहुल और स्टालिन का साथ अब बोझ बन गया है ?

क्या राहुल और स्टालिन का साथ अब बोझ बन गया है ?

पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति में गठबंधन केवल विचारधारा का मिलन नहीं, बल्कि अस्तित्व की गणितीय अनिवार्यता होते हैं। लेकिन जब ‘मछुआरा’ और ‘मछली’ दोनों को लगने लगे कि वे एक-दूसरे के बिना भी समंदर पार कर सकते हैं, तो संकट गहरा जाता है। आज तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और डीएमके (DMK) के बीच कुछ ऐसा ही ‘माचोवाद बनाम उत्तरजीविता’ का संघर्ष चल रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत से दूर रखने का जो उत्साह ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में था, वह हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार की हार के बाद अब एक रक्षात्मक मुद्रा में बदल चुका है।

चुनावी रणभेरी और अस्तित्व का संकट

अप्रैल-मई 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल राज्यों की सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह राष्ट्रीय विपक्ष के भविष्य का ‘लिटमस टेस्ट’ भी होंगे। पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे विपक्षी किलों में होने वाली हार राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी मोर्चे की कमर तोड़ सकती है। कांग्रेस के लिए केरल और असम ‘अस्तित्व’ की लड़ाई हैं। जहाँ केरल में उसे सत्ता विरोधी लहर का लाभ मिलने की उम्मीद है, वहीं असम में वह मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अजेय मशीनरी के सामने मुख्य चुनौती है। लेकिन असली पेच तमिलनाडु में फंसा है, जहाँ कांग्रेस एक ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका से अब ऊब चुकी है।

23 साल पुराना साथ और बढ़ती दूरियां

कांग्रेस और डीएमके का साथ दो दशकों से अधिक पुराना है। 2004 से लेकर अब तक, कुछ अपवादों (जैसे 2014 का 2जी घोटाला दौर) को छोड़ दें, तो यह गठबंधन अटूट रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना स्वतंत्र सांगठनिक ढांचा काफी कमजोर हो चुका है। 2001 में जी.के. मूपनार के निधन के बाद से राज्य में कोई ऐसा ‘जननेता’ नहीं उभरा जो अकेले दम पर डीएमके या एआईएडीएमके को चुनौती दे सके।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है कि जमीनी स्तर पर सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। 2021 के चुनावों में कांग्रेस ने केवल 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जो 2016 की तुलना में एक बड़ा त्याग था। अब पार्टी के भीतर एक धड़ा अभिनेता विजय की नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के साथ जाने की वकालत कर रहा है, ताकि डीएमके के प्रभुत्व से बाहर निकला जा सके।

अभिनेता विजय: शतरंज की बिसात पर नया खिलाड़ी

अभिनेता से नेता बने विजय ने राजनीतिक बिसात को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। कांग्रेस का एक हिस्सा इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है—डीएमके से नाता तोड़ो, विजय के साथ गठबंधन करो, और चुनाव के बाद की रणनीति के लिए बेहतर मोलभाव करो। लेकिन यह एक ‘हाई-रिस्क गैंबल’ है। तमिलनाडु में अल्पसंख्यक वोट (ईसाई और मुस्लिम लगभग 13%) पारंपरिक रूप से डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का आधार रहे हैं। यदि कांग्रेस अलग होती है, तो यह वोट बैंक बंट सकता है, जिसका सीधा लाभ भाजपा या एआईएडीएमके को मिल सकता है।

गठबंधन धर्म और दिल्ली की दुविधा

डीएमके के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया था, जो उनकी वफादारी का प्रतीक था। लेकिन सत्ता में आने के बाद डीएमके ने कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओं को प्रशासन में जो जगह दी है, वह नगण्य है। गठबंधन केवल बड़े नेताओं के हाथ मिलाने से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के दिल मिलने से चलते हैं।

संवैधानिक रूप से, भारत का संघीय ढांचा क्षेत्रीय दलों को शक्तिशाली बनाता है, लेकिन जब ये दल अपने राष्ट्रीय सहयोगियों को हाशिए पर धकेलते हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता ‘ताश के पत्तों’ की तरह ढहने लगती है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अनिश्चितता और असम में भूपेन बोरा जैसे नेताओं का पार्टी छोड़ना कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुँचा रहा है।

निष्कर्ष: स्थिरता या साहसिक कदम?

कांग्रेस के लिए यह समय ‘पुल बनाने’ का है, न कि ‘पुल तोड़ने’ का। तमिलनाडु में विजय के साथ जाना एक साहसिक प्रयोग लग सकता है, लेकिन राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह ‘इंडिया’ गठबंधन के अंत की शुरुआत हो सकती है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि भाजपा की चुनावी मशीनरी का मुकाबला करने के लिए अनुशासन और स्थिरता पहली शर्त है।

तमिलनाडु की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ स्टालिन को ‘सम्मान’ देना होगा और राहुल को ‘यथार्थ’ स्वीकार करना होगा। यदि यह तालमेल नहीं बैठा, तो 2026 के नतीजे केवल राज्यों की सरकारें नहीं बदलेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के मानचित्र से विपक्ष की प्रासंगिकता को भी धुंधला कर देंगे।

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