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तमिलनाडु: निजी स्कूलों में धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों पर ताला, क्या है विवाद?

पूनम शर्मा

तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर ‘धर्म’ और ‘शिक्षा’ को लेकर घमासान छिड़ गया है। राज्य की एम.के. स्टालिन सरकार (DMK) ने एक ऐसा आदेश जारी किया है, जिसने राज्य के निजी स्कूलों और धार्मिक संगठनों के बीच ठन गई है। सरकार का कहना है कि यह कदम स्कूलों के शैक्षणिक माहौल को बचाने के लिए है, जबकि विरोधी इसे सीधे तौर पर एक खास विचारधारा को निशाना बनाने वाला कदम बता रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में तमिलनाडु स्कूल शिक्षा विभाग ने एक सख्त निर्देश जारी किया है। इसके तहत राज्य के किसी भी निजी स्कूल (Private Schools) के परिसर का उपयोग राजनीतिक या धार्मिक कार्यक्रमों के लिए नहीं किया जा सकेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्कूल केवल शिक्षा के मंदिर होने चाहिए और वहां ऐसी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी जिससे बच्चों के मन पर राजनीतिक या सांप्रदायिक प्रभाव पड़े।

प्रथम दृष्टया यह फैसला तर्कसंगत लगता है, लेकिन विवाद की जड़ इसके “अपवादों” (Exemptions) और इसे लागू करने के तरीके में छिपी है।

हिंदू मुन्नानी और अन्य संगठनों का कड़ा विरोध

इस आदेश के बाहर आते ही दक्षिणपंथी संगठनों, विशेषकर हिंदू मुन्नानी (Hindu Munnani) ने मोर्चा खोल दिया है। संगठन का आरोप है कि डीएमके सरकार का यह आदेश “समानता” के सिद्धांत पर नहीं, बल्कि “तुष्टीकरण” की राजनीति पर आधारित है।

हिंदू संगठनों का मुख्य सवाल यह है: क्या यह नियम अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों (Minority Institutions) पर भी उतनी ही सख्ती से लागू होगा?

विपक्ष का दावा है कि तमिलनाडु में अक्सर सरकारी आदेशों की आड़ में केवल हिंदू रीति-रिवाजों या उनसे जुड़े आयोजनों को निशाना बनाया जाता है, जबकि मिशनरी और अल्पसंख्यक स्कूलों में होने वाली धार्मिक प्रार्थनाओं या सभाओं को ‘छूट’ दे दी जाती है। हिंदू मुन्नानी ने इसे “हिंदू विरोधी” कदम बताते हुए सवाल किया है कि क्या सरकार चर्च या मदरसों द्वारा संचालित स्कूलों में होने वाली गतिविधियों पर भी इसी तरह की रोक लगाएगी?

शिक्षा बनाम विचारधारा की जंग

सरकार का तर्क है कि कई निजी स्कूलों के मैदानों का उपयोग आरएसएस (RSS) या अन्य संगठनों द्वारा ड्रिल और शाखाओं के लिए किया जाता रहा है। डीएमके सरकार पिछले काफी समय से इन गतिविधियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी। इस नए आदेश को उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि अगर सरकार का मकसद वाकई शिक्षा का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बनाए रखना है, तो यह नियम बिना किसी भेदभाव के हर धर्म और हर संस्थान पर लागू होना चाहिए। यदि इसमें किसी भी प्रकार की ‘सेलेक्टिव अप्रोच’ (चुनिंदा रवैया) अपनाई गई, तो यह कानूनी और सामाजिक विवाद को और तूल देगा।

स्थानीय राजनीति पर असर

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ‘द्रविड़ियन विचारधारा’ और ‘धार्मिक पहचान’ के बीच का अखाड़ा रही है। डीएमके खुद को नास्तिक और तर्कवादी बताती है, लेकिन उन पर अक्सर यह आरोप लगते हैं कि वे केवल बहुसंख्यक हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीकों पर कड़ाई करते हैं। इस नए प्रतिबंध ने भाजपा और अन्नाद्रमुक (AIADMK) जैसे दलों को भी सरकार को घेरने का मौका दे दिया है।

अभिभावकों के बीच भी इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। कुछ का मानना है कि स्कूलों को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए, वहीं कुछ का तर्क है कि छुट्टियों के दिनों में अगर स्कूल परिसर का उपयोग योग शिविरों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए होता है, तो इसमें बुराई क्या है?

निष्कर्ष

फिलहाल, यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रह गया है। यह राज्य की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों के बीच की एक बड़ी बहस बन चुका है। क्या सरकार इस आदेश को निष्पक्ष रूप से लागू कर पाएगी? या फिर यह आदेश अदालती चक्करों में फंसकर रह जाएगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है—तमिलनाडु के स्कूलों की चारदीवारी के अंदर अब पढ़ाई से ज्यादा बाहर के शोर की चर्चा हो रही है।

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