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नक्सलवाद : लाल गलियारे का अवसान भारत की निर्णायक जीत

नक्सलवाद : लाल गलियारे का अवसान भारत की निर्णायक जीत

पूनम शर्मा
31 मार्च 2026 को भारत के आंतरिक सुरक्षा के मामले में कुछ बड़ा बदलाव आया लगता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो समयसीमा तय की थी वह बीत गई और अब नक्सलवाद लगभग खत्म होने की कगार पर है। दशकों से बस्तर और झारखंड के जंगलों में लाल आतंक का साया था लेकिन अब वहां विकास की आवाजें ज्यादा सुनाई दे रही हैं। गोलियां कम हो गई हैं और सड़कें बन रही हैं।

नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या बहुत तेजी से घटी है। पहले 126 जिले थे लेकिन अब सिर्फ सात ही बचे हैं। सुरक्षा बलों ने नेतृत्व को निशाना बनाया और कई बड़े नेता मारे गए या पकड़े गए। कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है जिससे संगठन कमजोर हो गया। वैचारिक रूप से भी यह आंदोलन पंगु सा हो चुका है। यह नीति ने माओवादियों की कमर तोड़ दी।

सरकार ने सिर्फ हथियारों पर भरोसा नहीं किया। नक्सल इलाकों में सड़कें बिछाई गईं स्कूल खोले गए और एकलव्य मॉडल से आदिवासियों को जोड़ा गया। जहां पहले राशन तक नहीं पहुंचता था वहां अब डिजिटल सुविधाएं हैं। यह सब सफलता का मुख्य कारण रहा। लेकिन शायद यह आसान नहीं था।

बची हुई चुनौतियां अभी भी हैं। 130 से 150 लड़ाके जंगलों में छिपे हो सकते हैं। असली काम अब सुशासन स्थापित करना है और आदिवासियों का भरोसा जीतना। ताकि नक्सली विचारधारा वापस न आए। यह हिस्सा थोड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि शांति को स्थिर रखना आसान नहीं।

लाल गलियारे में विकास के काम 2026 तक पहुँचे  हैं और बस्तर की सुरक्षा स्थिति बेहतर हो गई है। अमित शाह की समयसीमा के परिणाम साफ दिख रहे हैं। माओवादी नेतृत्व का खात्मा हुआ और भारत नक्सल मुक्त अभियान की दिशा में आगे बढ़ा। लेकिन सब कुछ परफेक्ट नहीं है यह तो बस एक ड्राफ्ट जैसा विचार है।

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