Site icon Samagra Bharat News website

राम मंदिर दान मामला: आरोपियों की पैरवी से इनकार

राम मंदिर दान मामला: आरोपियों की पैरवी से इनकार

समग्र समाचार सेवा

उत्तर प्रदेश ,अयोध्या 1 जुलाई : श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दान में कथित गबन से जुड़े मामले में आरोपियों की ओर से पैरवी न करने का अयोध्या (फैजाबाद) बार एसोसिएशन का प्रस्ताव कानूनी बहस का विषय बन गया है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय संविधान, अधिवक्ता अधिनियम और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के पेशेवर आचार नियमों के विपरीत है।

बार एसोसिएशन ने हाल ही में प्रस्ताव पारित कर अपने सदस्यों से कहा कि वे इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की ओर से अदालत में पेश न हों। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि यदि कोई अधिवक्ता आरोपियों की पैरवी करना चाहता है तो उसे एसोसिएशन से अनुमति लेने के साथ प्रत्येक आरोपी के लिए पांच लाख रुपये जमा कराने होंगे।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम स्पष्ट करते हैं कि कोई अधिवक्ता केवल विशेष परिस्थितियों में ही मुकदमा लेने से इनकार कर सकता है। किसी आरोपी के कथित अपराध की प्रकृति के आधार पर उसका मुकदमा न लड़ना पेशेवर दायित्वों के विरुद्ध माना जाता है। अधिवक्ता का दायित्व कानून के प्रति होता है, न कि आरोपी के प्रति व्यक्तिगत राय के आधार पर।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई मामलों में ऐसे प्रस्तावों को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर चुका है। वर्ष 2010 के  एएस मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु राज्य  मामले में अदालत ने कहा था कि किसी बार एसोसिएशन द्वारा किसी विशेष आरोपी की पैरवी पर रोक लगाने वाला प्रस्ताव संविधान, कानून और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ है। बाद के फैसलों में भी न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक आरोपी को अपनी पसंद के अधिवक्ता से बचाव का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हिस्सा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई आरोपी वकील का खर्च वहन नहीं कर सकता तो उसे निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराना भी राज्य की जिम्मेदारी है। ऐसे में किसी बार एसोसिएशन द्वारा सामूहिक रूप से पैरवी से इनकार करना न्याय तक समान पहुंच के सिद्धांत को प्रभावित करता है और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।

Exit mobile version