Site icon Samagra Bharat News website

तंबाकू का हवाला देकर कैंसर का क्लेम नहीं रोक सकती कंपनी

समग्र समाचार सेवा
अहमदाबाद: देश में स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) और मेडिक्लेम को लेकर अक्सर बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम खारिज करने के मामले सामने आते रहते हैं। इसी कड़ी में गुजरात से एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरी कानूनी खबर सामने आई है। गुजरात के दाहोद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि बीमा कंपनियां केवल इस आधार पर किसी मरीज के कैंसर के इलाज का बीमा दावा (Insurance Claim) नहीं रोक सकतीं कि उसे तंबाकू के सेवन से बीमारी हुई थी, बशर्ते पॉलिसी के नियमों और शर्तों में इसका स्पष्ट उल्लेख न हो।

क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?

यह पूरा कानूनी विवाद रामचंद्र पमनानी नामक मरीज के इलाज से जुड़ा हुआ है। पीड़ित मरीज को मुंह का कैंसर (Oral Cancer) होने के बाद इलाज के लिए अहमदाबाद के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इस दौरान उनके कैंसर के उपचार पर कुल 13.21 लाख रुपये का भारी-भरकम खर्च आया। इलाज पूरा होने के बाद परिवार की तरफ से यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के समक्ष बीमा क्लेम प्रस्तुत किया गया। लेकिन बीमा कंपनी ने नियमों का हवाला देते हुए पूरी राशि देने के बजाय केवल 2.33 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया और बाकी की बड़ी रकम देने से साफ इनकार कर दिया। कंपनी का तर्क था कि मरीज की यह बीमारी तंबाकू के सेवन के कारण हुई थी, जो बीमा पॉलिसी के दायरे से बाहर है।

उपभोक्ता आयोग की कड़ी टिप्पणी और कानूनी तर्क

बीमा कंपनी के इस रवैये से परेशान होकर पीड़ित परिवार ने दाहोद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। मामले की लंबी सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों के तर्कों और दस्तावेजों की बारीकी से जांच की। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने जिन चिकित्सीय opinions और दस्तावेजों का हवाला दिया था, उनका समर्थन करने वाले संबंधित डॉक्टरों के शपथ-पत्र (Affidavits) रिकॉर्ड पर पेश नहीं किए गए थे। सबसे अहम बात यह रही कि उपभोक्ता आयोग ने पाया कि जिस पॉलिसी क्लॉज के तहत कंपनी ने क्लेम खारिज किया था, उसमें कहीं भी ‘तंबाकू’ शब्द का स्पष्ट जिक्र नहीं था। अदालत ने यह साफ किया कि कंपनियां अपनी मर्जी से पॉलिसी की शर्तों में ऐसे बिंदु नहीं जोड़ सकतीं जो मूल अनुबंध में लिखित रूप में मौजूद न हों।

बीमा कंपनी को मुआवजा और बकाया राशि चुकाने का निर्देश

ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के फैसले को मनमाना और सेवा में कमी (Deficiency in Service) करार दिया। आयोग ने आदेश दिया कि बीमा कंपनी आदेश जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर शेष बची हुई 7.66 लाख रुपये की पूरी राशि शिकायतकर्ता के उत्तराधिकारियों को अदा करे। इसके अतिरिक्त, मरीज के परिवार को हुई मानसिक पीड़ा व परेशानी के लिए 2,000 रुपये तथा मुकदमे और कानूनी प्रक्रिया के खर्च के रूप में भी 2,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया। इस फैसले से उन तमाम पॉलिसीधारकों को एक मजबूत कानूनी संबल मिला है, जिन्हें बीमा कंपनियां अक्सर तकनीकी बहानों या अस्पष्ट शर्तों का हवाला देकर उनके वैध दावों से वंचित कर देती हैं।

Exit mobile version