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खड़गे रैली शुद्धिकरण विवाद पर चिराग पासवान की प्रतिक्रिया

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 अगस्त: उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ और हवन के मामले ने देश की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। इस पूरे विवाद पर अब केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का बयान सामने आया है। चिराग पासवान ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि आज भी देश में किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति या पहचान के आधार पर भेदभाव जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह एक बेहद गंभीर और चिंता का विषय है।

कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा राजनीतिक हमला

इस पूरे प्रकरण को लेकर जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर कड़े हमले किए और इसे छुआछूत का दूसरा रूप करार दिया, तो चिराग पासवान ने उसका जवाब देते हुए कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। चिराग पासवान ने कहा कि जो लोग आज दलितों के अधिकारों और समाज में हो रहे भेदभाव को लेकर बड़ी-बड़ी चिंताएं जता रहे हैं, वे वही लोग हैं जिन्होंने आजादी के बाद सबसे लंबे समय तक देश पर शासन किया। उन्होंने सवाल किया कि यदि इतने दशकों तक सत्ता में रहने के बाद भी समाज की मूल सामाजिक व्यवस्था में सुधार नहीं आया, तो इसकी जवाबदेही किसकी है?

दलित उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव पर दोहरी बहस

हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष की रैली के बाद कुछ दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा गंगाजल छिड़ककर ‘शुद्धिकरण’ किए जाने के बाद से राजनीतिक गलियारों में इस पर पक्ष और विपक्ष की तीखी प्रतिक्रियाएं जारी हैं। कांग्रेस पार्टी इसे सीधे तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे की दलित पहचान और उनके अपमान से जोड़ रही है, वहीं विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा इस पर लगातार जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है। दूसरी ओर, एनडीए के सहयोगी के रूप में चिराग पासवान ने स्पष्ट किया कि सरकार समाज में किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ पूरी तरह से संवेदनशील है, लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक रोटियां सेकने वालों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

संसद से लेकर सड़कों तक गरमाया सियासत का बाजार

यह पूरा विवाद केवल एक मैदान के शुद्धिकरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद के सत्र से लेकर सड़क तक इसने तूल पकड़ लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है ताकि सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में साधा जा सके। बहरहाल, इस घटना ने एक बार फिर देश में जातिगत पूर्वाग्रहों, सामाजिक समानता और राजनीतिक दलों की भूमिका पर एक बहुत बड़ी बहस छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले दिनों में चुनावी राज्यों की राजनीति पर पड़ना तय है।

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