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यूपीआई शुल्क विवाद पर राहुल गांधी का हमला

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 15 सितंबर: देश में डिजिटल भुगतान के सबसे लोकप्रिय माध्यम यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) को लेकर एक नया राजनीतिक और आर्थिक विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में सरकार द्वारा जारी एक नई अधिसूचना (Notification) के बाद से विपक्षी दल केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर हो गए हैं। सरकार के नए नियमों के मुताबिक, 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेन-देन और रुपे (RuPay) डेबिट कार्ड से किए जाने वाले भुगतानों पर किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जाएगा। हालांकि, इस सीमा से ऊपर के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की संभावना को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है।

अमेरिकी दबाव और ज़ीरो-MDR नीति पर सवाल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी भुगतान कंपनियां लंबे समय से भारत की ‘ज़ीरो-MDR’ नीति का विरोध करती आ रही थीं, और अब सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए इस नीति को बदलने का रास्ता चुपचाप खोल दिया है। राहुल गांधी ने कहा कि भले ही सरकार यह दावा कर रही है कि आम ग्राहकों से कोई फीस नहीं ली जाएगी, लेकिन 2,000 रुपये से अधिक के जिन मर्चेंट लेन-देन पर MDR लगाया जाएगा, दुकानदार उस अतिरिक्त लागत की भरपाई वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ाकर आम जनता से ही करेंगे।

लेन-देन के आंकड़े और विपक्ष की चिंताएं

कांग्रेस पार्टी के नेताओं का तर्क है कि हालांकि 2,000 रुपये से ऊपर के लेन-देन कुल वॉल्यूम का एक छोटा हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू (Transaction Value) का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं बड़े भुगतानों से आता है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने भी सरकार की इस नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह डिजिटल पेमेंट्स पर एक प्रकार का नया अप्रत्यक्ष कर थोपने जैसा है। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इस प्रकार के बदलावों से भविष्य में आम आदमी के रोजमर्रा के लेन-देन भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार को धक्का लग सकता है।

सरकार और पक्ष का रुख

दूसरी ओर, सरकार और वित्तीय विशेषज्ञों का यह तर्क रहा है कि यूपीआई के बढ़ते विशाल दायरे को सुरक्षित और निरंतर बनाए रखने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा, फ्रॉड प्रिवेंशन और तकनीकी बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश की आवश्यकता है। सरकार के अनुसार, केवल सब्सिडी या शून्य शुल्क के मॉडल पर लंबे समय तक डिजिटल पेमेंट्स इकोसिस्टम का विस्तार करना संभव नहीं है, और एक संतुलित वित्तीय ढांचा होना आवश्यक है। बहरहाल, इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आने वाले दिनों में संसद से लेकर बाहर तक इस पर गरमागरम बहस देखने को मिल सकती है।

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