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पहले ऐसा लगता था कि शायद कॉर्पोरेट घराने, धंधों में घाटे के कारण बैंकों के कर्ज नहीं चुका पाते लेकिन अब तो धीरे-धीरे इसकी परतें खुलने लगी हैं कि बैंक और कॉर्पोरेट घराने आपसी सहमति से बैंकिंग के पैसे पर ही धंधा करते हैं और दोनों की हिस्सेदारी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रहती है।

केंद्र सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना को राजनीतिक दलों को चंदा देने का पारदर्शी तरीका बताते हुए शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के समक्ष कहा कि इसमें काले धन की कोई संभावना नहीं है।