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मैक्सिकन फिल्म रेड शूज (जापाटोस रोजोस) के निर्देशक कार्लोस एशेलमैन कैसर का कहना है कि यह फिल्म मेरे लिए बहुत खास है। इसने मुझे बहुत गहराई तक प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि किसी महोत्सव से अधिक यह कलाकारों की व्यक्तिगत यात्रा है, जो मेरे लिए अधिक कहीं महत्वपूर्ण है।
पुरुष मात्र संख्या भर नहीं हैं, बल्कि सम्मानित सजीव व्यक्ति हैं। धन बटोरने के चक्कर में लोगों का एक वर्ग इस तथ्य को भूल जाता है और अपहरण एवं मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त हो जाता है। गोवा में 53वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अंतर्राष्ट्रीय पैनोरमा के तहत दिखाई जा रही मैक्सिकन फिल्म ‘सोल्स जर्नी’ मेक्सिको में मानव तस्करी की इस बेहद संवेदनशील कहानी को प्रस्तुत करती है।
“यह गहन सामाजिक समस्या को मानवीय रूप से प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास है”: निर्देशक सौरभ कांति दत्ता
मानव तस्करी की शिकार यौनकर्मियों के बचाव और पुनर्वास पर आधारित सौरभ कांति दत्ता की वृत्तचित्र फिल्म फातिमा को भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) के 53वें संस्करण में प्रदर्शित किया गया। यह वृत्तचित्र फिल्म इसी नाम की एक महिला फातिमा खातून के उतार-चढ़ाव भरे जीवन की दास्तान बयां करती है।
“हम जिस चीज के लिए संघर्ष करते हैं वह भारत के वास्तविक लोगों के लिए है। वे शायद नहीं जानते हैं कि देश का राष्ट्रपति कौन है या कोलकाता या मुंबई कहां है, लेकिन ये भारत के असली लोग हैं।” लेखिका-सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म ‘महानंदा’ इन शब्दों के पीछे की भावना को जीवंत करती है,
आयुष्मान फिल्म के निर्देशक जैकब वर्गीज़ ने कहा, “आयुष्मान ग्रामीण भारत के वंचित वर्ग वाले 14 वर्ष के दो ऐसे बालकों की कहानी है, जो एचआईवी पॉजीटिव हैं। वे एचआईवी मरीजों के साथ बरते जाने वाले भेदभाव और सामाजिक कलंक का सामना करते हुये मैराथन दौड़ों में हिस्सा लेते हैं तथा मरीजों के मन में सकारात्मक बदलाव व उम्मीद जगाते हैं।”
मराठी भाषा में बच्चों को सोने के समय सुनाई जाने वाली कहानियां अक्सर ‘एकदा काय झाला’ वाक्यांश से शुरू होती हैं। इस वाक्यांश का अर्थ ‘एक समय की बात है’ होता है।
“धाबरी कुरुवी” एक ऐसी आदिवासी लड़की की प्रचंड यात्रा को दिखाती है, जो रूढ़िवाद से लड़ती हैं और खुद को उन जंजीरों से मुक्त करना चाहती हैं, जिनसे समाज व समुदाय ने उसके जैसे दूसरों को जकड़ रखा है। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली फिल्म है, जिसमें केवल जनजातीय समुदाय से संबंधित कलाकारों ने अभिनय किया है।
भारत के 53वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा खंड में दिखाई जा रही फिल्म अरियप्पु के निर्देशक महेश नारायणन ने कहा कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और पारंपरिक सिनेमा थिएटर सह-अस्तित्व में बने रहने वाले हैं।
“मेरे लिए सफलता का मतलब रोजाना सुबह उठना और वही करना है, जो मुझे पसंद है, और जो मैं हमेशा से करना चाहता था।” यह बात फुकरे फिल्म के लोकप्रिय अभिनेता वरुण शर्मा ने कही। वह आज गोवा में 53वें इफ्फी में “इन-कन्वर्सेशन” सत्र में “हाउ टू कार्व योर नीश” के अंतर्गत दर्शकों को संबोधित कर रहे थे।
‘सिया’ एक असरदार फिल्म है जो हमारी सामाजिक न्याय प्रणाली को प्रतिबिंबित करती है। ये उन लोगों के मानवीय पक्ष को चित्रित करने का प्रयास है जिनके साथ अन्याय हुआ है। ये बातें कहीं फिल्म ‘सिया’ के निर्देशक मनीष मूंदड़ा ने, जो कि इंसाफ के लिए एक ख़राब पितृसत्तात्मक व्यवस्था से लड़ने वाली एक लड़की की दिल दहला देने वाली कहानी है।