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समुद्र-मंथन से उत्पन्न कालकूट विष की ज्वाला से दग्ध संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं ही उस महाविष का हथेली पर रखकर आचमन कर लिया और नीलकण्ठ कहलाए ।

दहशरे पर नीलकण्ड के दर्शन को शुभ माना जाता है। नीलकंठ पक्षी पर कहा गया है कि, नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध-भात का भोजन करियो, हमरी बात राम से कहियो। इन पंक्तियों में नीलकंठ को भगवान का प्रतिनिधि माना गया है।