मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल, 9 अप्रैल – मंगलवार को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले में वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन युद्ध का मैदान बन गया। हर स्तर पर इस कानून का विरोध करते हुए शुरू हुए ये प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो उठे। भीड़ ने सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया, पथराव किया, और रेल सेवाएं बाधित करने की खबरें भी सामने आईं।
जब मुर्शिदाबाद के कई हिस्सों में धुआं उठ रहा था, बीजेपी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें “दोहरा मापदंड रखने वाली”, “चुनिंदा आक्रोश दिखाने वाली”, और “डिजिटल पाबंदी के ज़रिये सच को दबाने वाली” करार दिया। जंगीपुर जैसे संवेदनशील इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, जिससे विपक्षी नेताओं और नागरिक संगठनों में और अधिक आक्रोश फैल गया।
“यह असहमति नहीं, विध्वंस है,” बीजेपी आईटी सेल प्रमुख और बंगाल प्रभारी अमित मालवीय ने कहा।
“प्रदर्शन के नाम पर असामाजिक तत्व तबाही मचा रहे हैं। सार्वजनिक और सरकारी संपत्तियों को जलाया जा रहा है। और ममता बनर्जी क्या करती हैं? चुप्पी साध लेती हैं। वो महिला जो दूसरे राज्यों की घटनाओं पर मगरमच्छ के आँसू बहाती हैं, आज अपने राज्य में कुछ बोलने को तैयार नहीं।”
ज़िले से आई तस्वीरों में जलती कारें, बंद दुकानें और गुस्साई भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश करती सशस्त्र पुलिस दिखाई दी। कई उपनगरीय ट्रेनें रेलवे ट्रैक पर उपद्रव की वजह से रुकी रहीं। सरकार भले ही कह रही हो कि “सब कुछ नियंत्रण में है”, लेकिन ज़मीनी हालात कुछ और ही बयान कर रहे हैं।
सबसे विवादास्पद निर्णय शायद जंगीपुर और आसपास के क्षेत्रों में पूर्ण इंटरनेट बंदी का रहा। अधिकारियों ने इसे अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए उठाया गया कदम बताया, लेकिन आलोचकों को इसमें छिपे हुए राजनीतिक मंतव्य नज़र आ रहे हैं।
“यह सुरक्षा नहीं, सच को दबाने की कोशिश है,” बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा।
“जब सीएए विरोध चल रहा था, ममता खुद सड़कों पर थीं, नारे लगा रही थीं, धरना दे रही थीं। आज जब उनका अपना इलाका जल रहा है, वो कहीं नज़र नहीं आ रहीं। इंटरनेट बैन सिर्फ दुनिया से सच छिपाने की उनकी कोशिश है।”
इन विरोधों की जड़ वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर बढ़ती नाराजगी है, जिसे विरोध करने वाले धार्मिक संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने और समुदाय के अधिकारों को कमज़ोर करने वाला बता रहे हैं। लेकिन जो प्रदर्शन शांतिपूर्ण होना चाहिए था, वो अब हिंसा, गिरफ़्तारी और दहशत का रूप ले चुका है।
राजनीतिक विश्लेषक इस बढ़ते तनाव को ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता की परीक्षा मान रहे हैं। हालांकि उन्होंने अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरोकार के रूप में पहचान बनाई है, लेकिन बीजेपी उन पर “तुष्टिकरण की राजनीति के उलटे पड़ने” का आरोप लगा रही है।
“जब उनका वोट बैंक बेकाबू होता है, तो वो इंटरनेट बंद करती हैं और अफसरों की आड़ में छिप जाती हैं। लेकिन अगर बीजेपी शासित राज्यों में कुछ गलत हो जाए, तो कुछ ही घंटों में वो प्रदर्शन पर उतर आती हैं। यह पूर्ण पाखंड है,” मालवीय ने आरोप लगाया।
स्थानीय नागरिक, जो इस टकराव के बीच फंसे हैं, सबसे ज़्यादा परेशान हैं। बाज़ार बंद हैं, सार्वजनिक परिवहन ठप है, और ज़रूरी सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं। इंटरनेट बंदी की वजह से लोग अपने रिश्तेदारों से बात नहीं कर पा रहे, जिससे तनाव और बढ़ रहा है।
जब राज्य जल रहा है, मुख्यमंत्री कार्यालय की चुप्पी ने हालात को और गंभीर बना दिया है। न तो कोई सार्वजनिक बयान, न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस—बस एक संक्षिप्त आधिकारिक बयान कि मामला “निगरानी में है।”
“ममता आखिर क्या छुपा रही हैं?” मालवीय ने तीखे लहजे में पूछा।
“जो महिला सीएए विरोध के दौरान ‘का का ची ची’ कर के रोती थीं, आज अचानक खामोश क्यों हैं? क्या यही पारदर्शिता और जवाबदेही है, जो उन्होंने बंगाल से वादा किया था?”
जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल नए उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है, राज्य सरकार की इस संकट पर प्रतिक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं—और इंटरनेट बैन व्यवस्था बनाए रखने का उपाय है या अराजकता को ढकने का मुखौटा, ये सवाल बना हुआ है।
