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परिवार में परम सुख

परिवार में परम सुख

           आज का भगवद् चिंतन 

   मानव जीवन के संस्कारों की प्रथम पाठशाला का नाम ही परिवार है। संस्कारों से परवरिश और परवरिश से परिवार का परिचय मिल जाता है। एक आदर्श परिवार के बिना एक आदर्श जीवन का निर्माण कदापि संभव ही नहीं। परिवार मनुष्य जीवन की सबसे प्रमुख और सबसे प्रथम इकाई होती है जिसमें माता-पिता के रूप में स्वयं वो निराकार ब्रह्म, साकार रूप में विराजमान रहता है।

    माता-पिता की सेवा ही समस्त देवी-देवताओं की सेवा मानी गई है। सच ही कहा गया है कि  जिस घर में माँ-बाप हँसते हैं, उसी घर में भगवान बसते हैं। एक लकड़ी अकेले आसानी से टूट जाती है और उन्हीं लकड़ी को जब बंडल बनाकर तोड़ने लगते हैं तो बहुत मुश्किल और कठिन हो जाता है। 

  इसी प्रकार जब हम अकेले पड़ जाते हैं तो कोई भी आसानी से हमें तोड़ सकता है लेकिन एक होते ही तोड़ने वाला स्वयं टूट जाता है। परस्पर प्रेम, सम्मान, समर्पण और सहयोग की भावना के साथ-साथ कर्त्तव्य निष्ठा से ही मकान घर और घर परिवार बनता है। आज की इस सदी में हम इकट्ठे होकर न रह सकें कोई बात नहीं लेकिन कम से कम एक होकर अवश्य रह सकते हैं। परिवार के साथ रहें, संस्कार के साथ रहें।

                                                                                        आचार्य पं. अशोक मिश्रा मुंबई

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