Browsing: त्रिदीब रमण
’यह मेरा हुनर है जो जादू दिखाता हूं मैं, तेरे सपनों की ताबीज बनाता हूं मैं; मेरे हर खेल के शहमात पर तुम ही तुम हो, ऐसे ही…
सियासत को तो यूं भी पंख फैला कर उड़ने की आदत होती है, ऐसे में जब बात हवाई अड्डों की हो तो सियासतदां भी आसमां से चुगली करने लग जाते हैं।
’क्या यह मौसम बदलने की आहट है मेरे सिर पर धूप व हाथों में छतरी है’ पटना में इस 23 जून को जब विपक्षी एका का…
’नाहक गुमान था इस कागज़ की कश्ती को अपने आप पर इक-इक आंसू से भी समंदर में सैलाब आ जाता है’ जीतना जिनकी आदतों में शुमार…
’जिस्म की गली में गोया वह मकान खंडहर ही रहा अपनी रूह के रेशों से जिसका चेहरा बुना था हमने’ अपने अवतरण काल से ही सियासत…
’कलम अगर खामोश हो तो, आतुर शब्दों की बेबसी समझिए शब्द अब बिकते कहां हैं, खरीदे भी नहीं जाते; यूं ही मुरझा जाते हैं, बंद मुख…
’आग से खेलने की तेरी हसरत से कौन नहीं वाकिफ था यही वजह थी तुम जिधर चले समंदर तेरे साथ चला’ 2024 के लोकसभा चुनावों की…
किनके अहसानमंद हैं मनोहर लाल?
खड़गे की असली चुनौती राहुल वफादारों से पार पाना है
क्या लौट के उद्धव पुराने घर आएंगे?