Browsing: पत्थर और शीशा दिल की बात नहीं सुनते कविता

पत्थर और शीशा जो कभी मेरे छूने से पिघल जाया करती थी आज मुझ से बात करने से भी कतराती है। अब कोई क्या करे, कब…