पं राजीव शर्मा
*- ब्राह्म काल , उषःकाल और प्रातःकाल शब्द अपने विशिष्ट लक्षण से युक्त पहचान वाले होते हैं। शास्त्रों में
इनका प्रयोग सावधानी पूर्वक प्रयुक्त हुआ है।ब्राह्म काल तीन घण्टे का होता है–
रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मुहूर्तों ब्राह्म संज्ञक:।
चार याम की रात्रि होती है।एक याम तीन घण्टे का होता है। रात्रि के अंतिम तीन घण्टे ब्राह्म संज्ञक होते हैं।मध्यम मान से रात्रि ३ से ६ (सूर्योदय) के बीच ब्राह्म काल होता है।इस तीन घण्टे में मध्य का एक घण्टा अत्यधिक महत्त्व का होता है।इसी में ब्राह्म काल की क्रियायें आरम्भ की जाती हैं।
अंतिमघण्टा जो होता है उसमें जातीहुई लुप्त तारका रात्रि होती है और उषा का आगमन होता है। उषःकाल में अरुणिमा होती है।
शास्त्रानुसार जब तक सूर्य का मध्य बिम्ब दर्शन न हो जाये अर्थात् सूर्य केन्द्र न दिख जाए तब तक सूर्योदय नहीं माना जाता—– सूर्योदयः मध्यबिम्ब- दर्शनाद्।
प्रातःकाल में साधारण व्यक्तियों के लिए स्नान-ध्यान – व्यायाम- यात्रा आदि करने का निर्देश है। विशिष्ट जन तो ब्राह्म मुहूर्त्त में ही ये क्रियायें कर लेते हैं।प्रश्न उठता है प्रातः काल कब से कब तक होता है? इसकी भी निश्चित परिभाषा मिलती है।
महर्षि गर्ग ने प्रातः को परिभाषित करते हुए कहा —
प्रातःशब्द: सार्द्ध-प्रहरात्मक-कालवाचकः।अर्थात् डेढ़ प्रहर को प्रातः काल कहते हैं। इस प्रकार से साढ़े चार घण्टे का प्रातः काल होगा। इसको और अधिक स्पष्ट करते हुए महर्षि ने कहा–
ललाटसम्मिते भानौ प्रथमः प्रहर: स्मृतः।
स एव सार्द्ध संयुक्तः प्रातरित्यभिधीयते ।।
जब सूर्य ऊपर उठता हुआ मनुष्य के ललाट प्रदेश तक आ जाता है तो वह प्रथम प्रहर कहलाता है। इसी में अर्द्ध प्रहर और जुड़ जाने से डेढ़ प्रहर ( ४ . ३० घण्टे का ) प्रातः काल होता है।
यह काल सूर्योदय से पूर्व आरम्भ होता है क्योंकि ललाट तक सूर्य आकाश में चढ़ने में देर नहीं लगती है। ललाट देशिक सूर्य से पूर्व के तीन घण्टे प्रातः काल में आते हैं।
जाड़े से गर्मी के बीच इस स्थिति में एक घण्टे का अंतर पड़ता है। अतः प्रातःकाल शब्द सूर्योदय प्राक् से लेकर
सूर्योदय पश्चात तक फैला होता है। मध्यम मान से यह काल ८:३० के आसन्न तक फैला होता है।
प्रातः काल के प्रभाव से कमल खिलने लगते हैं।सूर्योदय पूर्व पंखुड़ियां फैलना आरम्भ करती हैं और सूर्योदय होते ही पूरा पुष्प खिल उठता है।पुष्प खिलने का फैलाव लिया काल प्रातः काल होता है।
महर्षि गर्ग ने प्रातः काल पर जो प्रकाश डाला है वह अर्घ्य समय, पूजन समय और दिनचर्या की पूर्णता का समय होता है। इसी काल में टहलना , धूप सेवन करना भी लाभ कारक होता है।
दैनिक चर्या में प्रातः काल अग्निहोत्र कारक और आयुष्य वर्धक होने के कारण अत्यधिक महत्त्व रखता है।इस तरह की सूक्ष्म जानकारी हमारे महर्षियों ने हमारे जीवन को संवारने के लिए वितरित किया है।

