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परछाई

परछाई~ आलोक लाहड़

यह मैं नहीं, मेरी परछाईं है,
जो यहाँ हज़ारों मील दूर चली आई है।
मेरा दिल तो भारत में रहता है,
जहाँ रहते मेरे पिता, मेरी माई हैं।

वैसे तो भारत में भी कोई कमी न थी,
किंतु विदेश में बसने के लालच ने कहीं का न छोड़ा।
अब यह दौलत भी किस काम आई है?
देखो, कितनी दूर मेरी दीदी और मेरा भाई है।

बहन की शादी में मैं घर जा न सका,
अब पिता जी की जान पर बन आई है।
जिन्होंने पैसा-पैसा, पाई-पाई जोड़ हमें पाला,
अब कौन उनके दर्द में सहाय है?

पैसा मेरे पास है, किंतु मुझसे धनवान मेरा भाई है,
उसके सर पर पिता जी का हाथ, माँ की अरुणाई है।
जिन्होंने मुझे जन्मा, पाला-पोसा, उनकी सेवा न कर सका,
किस काम मेरी पढ़ाई आई है? जब माँ के आँचल में बैठा मेरा भाई है।

वर्षों से दीदी ने राखी नहीं भेजी, न ही मैंने दिवाली मनाई है,
होली पर किसी ने रंग नहीं डाला, न ही कभी दोस्तों की टोली घर आई है।
मेरा दिल तो भारत में धड़कता है, यहाँ तो बस तन्हाई है,
यह मैं नहीं हूँ, यह मेरी परछाईं है।परछाई

~ आलोक लाहड़

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