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पत्थर और शीशा

पत्थर और शीशा

पत्थर और शीशा
जो कभी मेरे छूने से पिघल जाया करती थी
आज मुझ से बात करने से भी कतराती है।
अब कोई क्या करे, कब तक पत्थर से टकराए
क्योंकि पत्थरों से बात नहीं होती
पत्थर वही दोहराते हैं जो वे सुनते हैं
प्रतिध्वनि गूँजती है बस , वार्तालाप नहीं होती।

शीशे भी पत्थर की तरह होते हैं।
मात्र सत्य प्रतिफलित करते हैं।

मस्तिष्क को भ्रमित कर सच को ही दिखा देते हैं।

मुझे शीशा नहीं देखना
शीशा मुझे मेरी सूरत दिखा देता है।
मुझे पत्थर से बात नहीं करनी
पत्थर मुझे, मेरी ही बात दोहरा देता है।

मैं सत्य खोजने निकला हूँ
और मुझे तुम चाहिए
क्योंकि पत्थर हो या शीशा या फिर दिल
समय के साथ तीनों टूट जाते है।
पत्थर और शीशा मन की बात कहाँ सुनते हैं l

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