Browsing: Tridib Raman

’शाख से टूटे पत्तों ने पलकें उठा आंधियों से कहा शुक्रिया तुम न होते तो कैसे अपने खून से करते इस जमीं को ऊर्वरा’ 24 की…

’कलम अगर खामोश हो तो, आतुर शब्दों की बेबसी समझिए शब्द अब बिकते कहां हैं, खरीदे भी नहीं जाते; यूं ही मुरझा जाते हैं, बंद मुख…